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किसानों की कर्ज माफी समाधान से ज्यादा समस्या

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Awadhesh kumar

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इसका उत्तर देने के लिए कई पहलुओं पर गंभीरता से विचार करना होगा। पार्टियां और सरकारें सभी किसानों के कर्ज माफी की घोषणा करती हैं, पर सारे किसान इसके दायरे में नहीं आते, न ही सारे कर्ज। उदाहरण के लिए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि 30 नवंबर 2018 की स्थिति के अनुसार सहकारी बैंक व छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंक में कृषकों के अल्पकालीन ऋण को माफ कर दिया गया। इन दो श्रेणियों के बैंकों से जिन किसानों ने अल्पकालिक कर्ज लिया होगा उनका ही बोझ उतरेगा। अधिसूचित वाणिज्यिक बैंकों के अल्पकालीन कृषि ऋण के परीक्षण के बाद कृषि कर्ज को माफ करने की कार्रवाई की जाएगी। राजस्थान में गहलोत के शब्दों में किसानों का सहकारी बैंकों का सारा कर्ज माफ किया जाएगा तथा वाणिज्यिक, राष्ट्रीयकृत व ग्रामीण बैंकों में कर्जमाफी की सीमा दो लाख रुपये रहेगी। गणना के लिए 31 नवंबर 2018 की समयसीमा तय की गई है। इससे खजाने पर करीब 18000 करोड़ रुपये का बोझ आएगा। मध्यप्रदेश में घोषणा हो गई लेकिन राज्य स्तर से लेकर जिला स्तर तक गठित समितियों की रिपोर्ट के आधार पर पात्रता और मापदंड तय होंगे और उसके बाद कर्ज माफी प्रमाण पत्र वितिरत किए जाएंगे। कहने का तात्पर्य यह कि चुनावी वायदा करने के बाद यथार्थ का सामना करना पड़ता है और माफी की राजनीतिक घोषणा के बावजूद इसका क्रियान्वयन वैसे ही नहीं होता जैसी कल्पना की जाती है। इसके रास्ते अनेक समस्यायें सामने आतीं हैं। इनमें प्रदेश की माली हालत सर्वप्रमुख है।

अगर राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा हुआ तो स्थिति कितनी विकट होगी इसकी कल्पना करिए। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए 1 सरकार ने 2008 में 3.73 करोड़ किसानों के 52,260 करोड़ रुपया कर्ज माफ किया था। वित्तीय स्थिति पर उतनी राशि का भी असर पड़ा। आज की स्थिति क्या है? वित्त मंत्रालय की तरफ से 17 दिसंबर को संसद में बताया गया कि वर्ष 2017-18 में 7.53 लाख करोड़ रुपये का फसल कर्ज दिया गया। वर्तमान वित्त वर्ष का आंकड़ा नहीं आया है, लेकिन यह 9 लाख करोड़ रुपये के आसपास है। हमारा कुल बजट 24 लाख करोड़ रुपये का है। अगर यह पूरी राशि माफ कर दी जाए तो राजकोषीय घाटा कुछ समय के लिए सीधे 7 प्रतिशत के आसपास पहुंच जाएगा। यह किसी भी खजाने के लिए खतरे की घंटी होती है। केवल छोटे और सीमांत किसानों का माफ किया गया तो क्या होगा? किसान कर्ज में सीमांत व छोटे किसानों की हिस्सेदारी लगभग 80 प्रतिशत होती है, लेकिन संस्थागत कर्ज में उनकी हिस्सेदारी 60 प्रतिशत है। इसके अनुसार भी हिंसाब लगाये तो 5 लाख करोड़ से ज्यादा की राशि चाहिए। यह देश के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग तीन प्रतिशत है। यही राजकोषीय स्थिति को चरमरा देगा। कहने की आवश्यकता यह कि राजनीतिक लोकप्रियतावाद का यह अतार्किक होड़ आत्मघाती है। एक राज्य में कर्ज माफी के वादे का असर देश भर में पड़ता है और लोग कर्ज वापस करना बंद कर देते हैं। कांग्रेस की घोषणा के बाद बैंकों ने वित्त मंत्रालय के समक्ष यह बात उठाई थी कि छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान से किसानों से कर्ज वसूलना मुश्किल हो गया है। लोग सोचते हैं कि माफ होना ही है तो कर्ज वापस करने की आवश्यकता क्या है। यूपीए सरकार द्वारा वर्ष 2008 में कर्ज माफी के बाद दो वर्षों तक कृषि कर्जों की वसूली कठिन हो गई थी। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों को देखें तो वर्ष 2012 में कृषि क्षेत्र में फंसे कर्जे यानी एनपीए की राशि 24,800 करोड़ रुपये थी जो 2017 में बढ़ कर 60,200 करोड़ रुपये हो गई। आगे भी ऐसे ही होने का खतरा बढ़ गया है। कृषि का नाम पर लिए गए कर्ज के अधिकांश भाग का एनपीए बनना तय है।

निस्संदेह, वास्तविक किसानों की दशा बुरी है और उनकी पीठ पर हाथ रखने की आवश्यकता है। किंतु कर्ज माफी समाधान नहीं समस्या है। ग्रामीण कर्ज पर हुए अध्ययनों से पता चलता है कि छोटे और सीमांत किसानों पर कर्ज का बोझ काफी है लेकिन उनमें से ज्यादा गैर बैंकिंग स्रोतों से लिया गया है। छोटा किसान बैंक के दरवाजे पर आज भी नहीं जाता है। वे आसपास के लोगों से कर्ज लेते हैं। इनको माफी से लाभ नहीं। कर्ज माफी की अपसंस्कृति के कारण गांव-गांव में धूर्त लोग कृषि के नाम पर कर्ज लेकर लौटाने की नहीं सोचते। 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार द्वारा कर्ज माफी के बाद से यह चरित्र पैदा हुआ है। सरकारों के पास ऐसी कोई मशीनरी नहीं जो पता कर सके कि किन किसानों के पास गैर बैंकिंग कर्ज कितना है। यह भी पता नहीं किया जाता कि कृषि के नाम पर लिए गए कर्ज में कितने वाकई कृषि के लिए ही लिया गया। उनमें कितनों की दशा कृषि के कारण बुरी है और उनको माफी की आवश्यकता है। इस तरह इससे वास्तविक किसानों का अत्यंत कम लाभ मिलता है।

माफ करने के बाद सरकारों को बैंकों को राशि चुकानी होती है। जाहिर है, माफ की गई राशि की पूर्ति सरकारें करों से ही करती है। हम आप जो कर देंगे उनसे ही इसकी पूर्ति की जाएगी। तो भार हमारे-आपके सिर ही आना है। अगर इससे वास्तविक किसानों का वास्तविक भला होता तो एक बार भार झेल लेने में समस्या नहीं थी। किंतु कर्जमाफी से किसानों की दशा सुधरी हो इसके कोई प्रमाण नहीं है। इसकी जगह किसानों की दशा सुधारने के लिए कृषि से संबंधित मूलभूत संरचना और संसाधन विकसित हों। कृषि सम्मान का पेशा बने, उसकी लागत कम हो, बीज, उर्वरक और सिंचाई तो उचित मूल्य पर उपलब्ध हो ही फसलों का उचित मूल्य भी मिले, कृषि बीमा योजना व्यवाहारिक रुप से लागू हो, आम आवश्यकता की सेवाएं यानी स्वास्थ्य, शिक्षा आदि तथा वस्तुएं उनको उचित मूल्य पर उपलब्ध हों……इन सबकी व्यवस्था हो। कर्ज माफी की राशि इन पर खर्च हो तो उसका स्थायी लाभ मिलेगा। सबसे बड़ी समस्या कृषि श्रमिकों की अनुपलब्धता है। यह बहुत बड़ा खर्च भी है। यदि मनरेगा को खेती से संबद्ध कर दिया जाए तो लघु और सीमांत किसानों का श्रमिकों का संकट दूर होगा और बहुत बड़ी राशि बचेगी।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर,

पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः 110092

दूरभाषः 01122483408, 9811027208

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सुशांत अपनी बहन और परिवार से नाराज थे – केआरके

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डेस्क | स्वर्गीय सुशांत सिंह राजपूत की गर्लफ्रेंड रिया चक्रबर्ती ने सुशांत के साथ की चैट मीडिया में वायरल की है|
इस चैट में उन्होंने यह बोला कि सुशांत सिंह राजपूत अपने बहन प्रियंका और अपने परिवार से बहुत नाराज़ थे| सोशल मीडिया पर सभी ने रिया पर नाराजगी जाहिर की। इस बीच कमाल राशिद खान ने रिया के चैट शेयर करने पर एक्ट्रेस पर निशाना साधा है।  केआरके ने ट्वीट किया, ‘रिया चक्रवर्ती तुम्हारा कहना है कि सुशांत सिंह राजपूत अपने परिवार की शक्ल भी नहीं देखना चाहता था। क्या यह सच है?
एक पिता का अकेला बेटा और 4 बहनों का प्यारा भाई अपने परिवार से नहीं मिलना चाहता था। क्या तुम सही कह रही हो ड्रामा क्वीन? और कितना गिरोगी? अब तो शर्म करो।’

ईडी ने रिया से 8 घंटे तक पूछताछ की और रिया के भाई शैविक से 18 घंटे तक पूछताछ चली|  11 अगस्त सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई तय की है|

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खट्टर ने क्यों कहा, हर भारतीय के लिए यह सुखद क्षण

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डेस्क | राम मंदिर जन्मभूमि पूजन के अवसर पर हरियाणा की मुख़्यमंत्री मनोहर लाल खटटर ने ट्वीट करते हुए कहा, यह सुखद क्षण हर भारतीय के लिए ऐतिहासिक है।  उन्होंने लोगों से अपने घरों के आंगन में दीपक जलाने और भाईचारे का संदेश देने का आग्रह किया। उन्होंने सियावर रामचंद्र की जय और जय श्री राम का नारा बोलते हुए ट्वीट कर अपनी खुशी व्यक्त की।

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दिल, दोस्ती, यारी यानि बहुत पर्सनल बात है

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सिद्धि वर्मा| आप सभी लोग दोस्त, दोस्ती, यारी आदि शब्दों को बहुत ही सुनते, लिखते, पढ़ते आये हो| लोग अपनी अच्छी दोस्त या दोस्ती के बारे में लिखते हैं| सोशल मीडिया पर उनके साथ तस्वीरें, कैप्शन, टैग सब कुछ करते हैं और फिर एक अचानक ऐसा कुछ होता कि आपकी दोस्ती टूट जाती है या दूर हो जाते हो, बातें बंद हो जाती हैं| 

आपको पता है इसका क्या कारण है- इसका यह कारण है कि हम हद से ज्यादा विश्वास कर लेते हैं, उनपर आश्रित हो जाते हैं| 

ऐसा क्यों होता है? और कब होता है? 

देखिये, यह बात तो सच ही है जब दो अच्छे गहरे दोस्तों के बीच कोई अन्य तीसरा आ जाये तो वहाँ बैंड बज जाती है क्योंकि कोई भी यह नहीं चाहता है कि हमें छोड़कर हमारी इम्पोर्टेन्स किसी और को दी जाये| लेकिन यह बात भी तो सोचने समझने जानने वाली है कि हमेशा हर कोई हर किसी को एक जैसी वैल्यू नहीं दे सकता है| इसीलिए रियलिटी को एक्सेप्ट करके हमें उस दोस्ती में कोई भी किसी के भी प्रति ईर्ष्या, नफरत की भावना नहीं लानी चाहिए| 
अब आपके मन में यह सवाल जरूर उठ रहा होगा कि अगर गलती एक की है और हमने कुछ भी गलत नहीं किया तो फिर आपको उस समय उस दोस्ती, बंधन से अलग हो जाना चाहिए| क्योंकि क्या पता उस झूठी, धोखे वाली दोस्ती से अच्छी दोस्ती अच्छा या अच्छी इंसान के लायक हो अच्छी दोस्ती के लायक हो| 
अगर आप सही हो तो वह से अलग हटकर अपने फ्यूचर में ध्यान दीजिये| कुछ ऐसा करिये जिससे आपको इन सब चीजों को लेकर मन में कोई भी गिला शिकवा न हो| अगर आपके साथ किसी ने कुछ गलत किया होगा या झूठ बोला होगा तो एक न एक दिन उस इंसान को इस बात का पछतावा ज़रूर होगा कि उसने अपनी एक अच्छी दोस्त, दोस्ती गवां दी| 
तो आज से अच्छी संगति को अपनाएं| लोगों को पहचानना सीखिए और आपके लिए क्या सही है| क्या गलत है| उन सभी चीजों पर गौर फरमाइए और आगे बढिये| 
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