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चुनावों से अछूता है राजस्थान का यह गांव

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whitemirchi.com

समूचे राजस्थान में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां चरम पर हैं लेकिन तनोट गांव में आपको इसका कोई निशान तक नहीं मिलेगा| जी हाँ पाकिस्तान बॉर्डर से महज 10 किलोमीटर और जैसलमेर से तकरीबन 120 किलोमीटर दूर तनोट गांव राजस्थान का आखिरी गांव है जहाँ विधानसभा चुनावों के मौसम में राजस्थान का एक गांव ऐसा भी है जहां पोल के निशान तक दिखाई नहीं देते| बॉर्डर के नजदीक स्थित तनोट गांव में तेल का बड़ा भंडार बताया जाता है| वहां तनोट माता का प्रसिद्ध धार्मिक स्थल भी है लेकिन फिर भी ग्रामीणों की आजीविका मवेशियों के सहारे चल रही है| राजस्थान के इस अंतिम गांव की खबर लेने कोई राजनेता तक नहीं जाता|

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जाति पर आरोप-प्रत्यारोप

बॉर्डर के नजदीक स्थित 49 घरों और 495 मतदाताओं वाले इस गांव में समय जैसे आगे ही नहीं बढ़ा रहा हो| यहां के लोग हमेशा से मौसम की विपरीत परिस्थितियों को झेल रहे हैं| सूखे और बंजर जमीन वाले इस गांव में बकरियां और अन्य मवेशी भूख से मर रहे हैं| अब जब राजस्थान में चुनाव का मौसम चल रहा है तब तनोट गांव के लोग तमाम राजनीतिक पार्टियों से खासे नाराज हैं वे लोग बताते हैं कि अपनी बदहाल स्थिति के बारे में उन्होंने तकरीबन हर राजनीतिक पार्टियों से कहा है लेकिन सभी ने उन्हें नज़रअंदाज़ ही किया है|

सरकार जनता के मत से चलेगी सियासतदानों के मन से नहीं

एक अंग्रेजी वेबसाइट रिपोर्ट के मुताबिक आपको बता दें कि तनोट गांव में रहने वाले लोग जीवन की बुनियादी सुविधाओं से काफी दूर तो हैं ही साथ ही मौसम की चरम परिस्थितियों से भी लड़ रहे हैं| माना जाता है कि तनोट गांव में तेल का काफी बड़ा भंडार है| साथ ही गांव में तनोट माता का एक मंदिर भी है जहां तनोट माता के दर्शन हेतु हजारों श्रद्धालु आते हैं लेकिन इसके बावजूद भी इस गांव की परिस्थिति को सुधारने की दिशा में कोई प्रयास नहीं किया गया है| गांव के लोग अजीविका के लिए मवेशियों पर ही निर्भर रहते हैं| शौचालय या आवास के लिए भी किसी तरह का बजट गांव के लोगों के पास नहीं पहुंचा| इलाज के लिए गांव के लोग बीएसफ पद की मेडिकल सुविधा पर निर्भर रहते हैं| गांव के कुछ ही हिस्सों में बिजली आती है तो बाकी के हिस्सों में रहने वाले लोग चाँद-सितारों की रोशनी में सुबह के सूर्य निकलने का इंतज़ार करते हैं| सूखे की मार झेल रहे इस गांव के लोग पानी के लिए आर्मी और कभी-कभी होने वाली बरसात के सहारे अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं|

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करोना से हार गए सुरों के बंधु विश्वबंधु

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फरीदाबाद| विजय रामलीला कमेटी के पूर्व चेयरमैन व निर्देशक विश्वबंधु शर्मा पंचतत्व में विलीन हो गए। वह पिछले 7 दिनों से फरीदाबाद एन.आई.टी. के ई.एस.आई अस्पताल के आई.सी.यू. में करोना से जंग लड़ रहे थे| लेकिन हरि इच्छा से बन्धु जी ने जंगलवार सुबह 7 बजे इस नश्वर शरीर को छोड़ दिया। विजय रामलीला कमेटी के महासचिव सौरभ कुमार ने बताया कि विश्वबन्धु जी तीन तीन घण्टे निरंतर रयास किया करते थे और घंटों एक ही स्थान पर बैठ कर रामायण के श्री सुंदरकांड का पाठ वो सालों से करते आ रहे थे|  जिस से उनके लंग्स बहुत स्ट्रांग थे इसलिए वेंटीलेटर पर जाने के बाद भी उन्होंने पूरे दम से ये लड़ाई लड़ी और 7 दिनों से वो इस दर्द को झेल रहे थे।  
विश्वबंधु जी पिछले 56 बरसों से विजय रामलीला कमेटी का अभिन्न अंग रहे हैं| कमेटी का कहना है कि विजय रामलीला का मंच उनकी आवाज़ के बिना अकल्पनीय है। उन्होंने राम और सीता का रोल करीब 30 बरस किया|  गन्धर्व महाविद्यालय से संगीत की शिक्षा प्राप्त कर रामायण को संगीतमय ढंग से प्रदर्शित करने की दिव्य कला के वह स्वामी थे। संस्था में केशियर, महासचिव, निर्देशक से लेकर चेयरमैन पद तक सभी पर कार्यरत रह कर व समय समय पर अपनी सेवायें देते रहे हैं| कमेटी आज ऐसी महान आत्मा को शत शत नमन करती है और मर्यादा पुरुषोत्तम राम के इस सेवक को उनकी शरण प्राप्ति हो, ऐसी कामना करती है।
विश्वबंधु जी से जुड़े रहे उनके पडोसी राजेश शर्मा ने बताया कि वह सभी के लिए सहयोगी थे| वह सभी के कार्यों में मदद करने पहुँच जाते थे| सेक्टर में वह एक पिता की भूमिका में दिखते थे| एक बार हमारे यहाँ जागरण में सुबह से लेकर अगले दिन सुबह तक एक आयोजक की तरह चिंता करते रहे| हमने एक बड़ी विरासत खो दी| 

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लिंग्याज ने बनाया क्रेडिट कार्ड साइज का कंप्यूटर

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बोइची-इन.वी नाम के कंप्यूटर के साथ रखा गैजेट्स की दुनिया में कदम

फरीदाबाद | शिक्षण संस्था लिंग्यास विद्यापीठ, डीम्ड-टू-बी- यूनिवर्सिटी ने एक बार फिर ऐसा कुछ कर दिखाया है कि लोग अचंभित हो रहे हैं| इस बार विद्यापीठ के प्रोफेसर ने क्रेडिट साइज जितना कंप्यूटर तैयार किया गया है। इससे कंप्यूटर की दुनिया में क्रांति आ सकती है|

डॉ. नंद ने बताया कि मेरे इस छोटे से कंप्यूटर के जरिए आप कोई भी काम कर सकते हैं और उस डाटा को सेव भी कर सकते है।

इनोवेटर प्रोफेसर डॉ. नंद कुमार नेबताया कि इस कंप्यूटर को बनाने में पीसीबी(PCBप्रिंटिड सर्केट बोर्ड) बोर्ड का इस्तेमाल किया गया है। इसे बोइची-इन.वी (असम के एक फूल का नाम) का नाम दिया गया है। जो कम जगह और कम बिजली में चलेगा| इस छोटे कंप्यूटर को अपने घर के टीवी के साथ भी जोड़ा जा सकता है।उन्होंने बताया कि इसको बनाने में काफी समय लगा लेकिन अब यह सुखद अहसास दे रहा है| ये आकार मे छोटे जरूर हैं, लेकिन इसकी भंडारण क्षमता अधिक है।

लिंग्याज ग्रुप के चेयरमैन डा. पिचेश्वर गड्डे का कहना हैं कि डॉ. नंद के द्वारा बनाए गए इस इनोवेशन में उनकी मेहनत और समय दोनों नजर आता है। मुझे अच्छा लगता है कि लिंग्याज के पास डॉं नंद जैसे प्रोफेसर हैं।

क्या-क्या हैं इस कंप्यूटर में
इस छोटे कंप्यूटर को लिनक्स बेस्ड ऑप्रेटिंग सिसटम के साथ मिलकर रास्पबेरी पाई नामक सर्केट बोर्ड का इस्तेमाल कर इसे तैयार किया गया है। जिसमें 4 जीबी रैम, 16 जीबी एसडी मैमोरी कार्ड लगा हुआ है। इतना ही नहीं आप इसमें 64 जीबी तक का कार्ड भी लगा सकते हैं। इस पीसीबी बोर्ड में 2 एचडीएमआई (HDMI- हाई डेफिनेशन मल्टीमीडिया इंटरफेस ) माईक्रो पोर्ट लगे हुए हैं। जिससे इसकी हाई पिक्चर क्वालिटी देखी जा सकेगी। इस कंप्यूटर  में 4 यूएसबी पोर्ट है। जिसमें ऑडियो-विडियों, कैमरा, माइक्रो-फोन, हेड फोन भी अटैच किया जा सकता है। वहीं इंटरनेट की सुविधा के लिए ईथरनेट पोर्ट व वाई-फाई कनेक्शन जोड़ा गया है।इतना ही नहीं इसमें बच्चों के लिए गेम्स, पावर प्वाइंट व एक्सेल भी है।
क्या आए बदलाव
दुनिया का पहला सीपीयू(CPU) माइको प्रोसेसर बेस्ड  , 1970 के दशक में Intelद्वारा बनाया गया था। तब से लेकर अब तक इसके डिजाइन और इम्पलीमेंट में कई बदलाव आ चुके हैं। परन्तु इसके Fundamental Operation अर्थात काम करने के तरीके में ज्यादा बदलाव नहीं आया है।संगणन शक्ति (Computing Power) के संदर्भ में सीपीयू एक कंप्यूटर प्रणालीका सबसे महत्वपूर्ण तत्व (Important element)है। प्रोसेसर को महत्वपूर्ण बनाने में इसके कम्पोनन्ट का बहुत बड़ा योगदान है।

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सीटीओ एंजियोप्लास्टी स्टेंटिंग से बाईपास सर्जरी से बचाव संभव : डा. बंसल

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डा. बंसल ने बताया कि हृदय में क्रिटिकल ब्लॉकेज के कारण मरीज़ की हृदय के पंप करने की क्षमता बहुत धीमी हो गयी थी, जो केवल 30 प्रतिशत रह गई थी, जब हृदय में इस तरह के जटिल ब्लॉक होते हैं, तो मरीजों को अक्सर बाईपास सर्जरी के लिए कहा जाता है।

एसएसबी अस्पताल ने काम्प्लेक्स एंजियोप्लास्टी के जरिए मरीज को दिया नया जीवन
फरीदाबाद। चिकित्सा क्षेत्र में अग्रणीय एसएसबी अस्पताल के डाक्टरों ने काम्प्लेक्स एंजियोप्लास्टी के जरिए मरीज को नया जीवन दिया है। मरीज की हालत इतनी गंभीर थी कि उसे बाईपास सर्जरी की जरूरत थी परंतु अस्पताल के डाक्टरों की कुशलता के चलते उसकी सीटीओ एंजियोप्लास्टी की गई, जिससे उसे नया जीवन मिला। अस्पताल के निदेशक एवं वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डा. एस.एस. बंसल ने बताया कि 62 वर्षीय रमेश सिंह लम्बे अरसे से छाती में दर्द तथा सांस फूलने की शिकायत से पीडि़त थे। उन्हें एसएसबी अस्पताल में एनजाइना के दर्द की शिकायत की वजह से भर्ती कराया गया। मरीज़ की एंजियोग्राफी की गई, जिसमें उनके हृदय की तीन धमनियों में से दो धमनियां में पुराने ब्लॉक्स थे जो बहुत सख्त तथा कैल्शियम युक्त थे। मरीज़ को ह्रदय की तीसरी आर्टरी में पहले से स्टंट डला हुआ था। डा. बंसल ने बताया कि हृदय में क्रिटिकल ब्लॉकेज के कारण मरीज़ की हृदय के पंप करने की क्षमता बहुत धीमी हो गयी थी, जो केवल 30 प्रतिशत रह गई थी, जब हृदय में इस तरह के जटिल ब्लॉक होते हैं, तो मरीजों को अक्सर बाईपास सर्जरी के लिए कहा जाता है। ऐसे मामलों में एंजियोप्लास्टी बेहद मुश्किल है और इसके लिए डॉक्टर का अनुभवी होना बहुत महत्वपूर्ण है। ऐसे जटिल ब्लॉकेज के लिए विश्व के अनुभवी से अनुभवी डॉक्टर भी फेमोरल आर्टरी से ही एंजियोप्लास्टी करते है परन्तु इस केस में मरीज़ की फेमोरल आर्टरी पूरी तरह से ब्लॉक थी, जिसकी वजह से फेमोरल आर्टरी से एंजियोप्लास्टी करना संभव नहीं था । ऐसे जटिल ब्लॉकेज में रेडियल रूट यानि कलाई की धमनी से एंजियोप्लास्टी करना बेहद चनौतीपूर्ण था इसीलिए मरीज़ के सख्त ब्लॉक्स को खोलने के लिए उन्होंने सीटीओ वायर्स एवं माइक्रो कॅथेटर्स का उपयोग कर हाथ की धमनी से मरीज़ की सफल एंजियोप्लास्टी की। डा. एस.एस. बंसल ने बताया कि आधुनिक तकनीक एवं अपने 28 वर्षों के अनुभव से मरीज़ की रेडियल आर्टरी से एंजियोप्लास्टी कर बाईपास सर्जरी की संभावनाओं को दूर कर दिया। उन्होंने बताया कि यह सफलता उन हृदय रोगियों के लिए उम्मीद पैदा करती है जो पहले से ही गंभीर बिमारियों से ग्रसित है या फिर जो मरीज़ बाईपास सर्जरी नहीं करवाना चाहतें है। सीटीओ जैसे जटिल ब्लॉकेज का इलाज़ पहले बाईपास सर्जरी के द्वारा किया जाता था, परन्तु नई तकनीक एवं डॉक्टर के अनुभव से ऐसे जटिल ब्लॉक्स को रेडियल आर्टरी के द्वारा खोल कर उस ब्लॉक में स्टेंटिंग करना संभव है। यह तकनीक मरीज़ों के लिए एक वरदान है। डा. बंसल ने बताया कि उन्होंने फरीदाबाद में पहली बार रेडियल एंजियोग्राफी 15 साल पहले शुरू की थी और हम ऐसे कई जटिल केस कर हज़ारों मरीज़ों की बाईपास सर्जरी की संभावनाओं को दूर कर पाये। उन्होंने बताया कि कलाई के माध्यम से डबल जटिल सीटीओ ब्लॉकेज को सफलतापूर्वक खोलना बहुत कठिन है और यह फरीदाबाद शहर का पहला केस है जिसे हम सफलतापूर्वक कर पाये है। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य है कि लोगों को वाजिब दामों पर उच्चस्तरीय चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराई जाए और इसी उद्देश्य को लेकर वह और उनके साथी डाक्टर प्रयासरत है। भविष्य में भी वह चिकित्सा क्षेत्र में ऐसी आधुनिक पद्धतियां अपनाएंगे, जिससे शहर के लोगों को उच्चस्तरीय चिकित्सा सुविधा के लिए बाहर नहीं पड़ेगा।

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