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आ…..अब हम लौट चलें….खुशी की ओर….

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whitemirchi.com

आ…..अब हम लौट चलें….खुशी की ओर….आज शहरों में लोगों की जीवन शैली दिन पर दिन अति आधुनिक होती जा रही है और अपने को आधुनिक का प्रतीक दिखाने के चक्कर में अपनी खुशियों के पैमाने और अर्थ दोनों ही बदलते जा रहे हैं। आजकल लोगों की नये तरीके की जीवन शैली विकास की कमशकश और भागमभाग से त्रास्त दिख रही है। केवल ऊपरी मुस्कान का दिखावा बढ़ रहा है – अंतर की वास्तविक खुशी तो गायब हो रही है। आधुनिक हो रहे जीवन में यदि आराम बढ़ता है तो कोई विवाद नहीं हो सकता, पर आज की आधुनिकता की कीमत परिवार के तनावमुक्त स्वस्थ वातावरण की बलि देकर नहीं चुकाई जा सकती। शायद हमारे बच्चे पहले ही ऐसे वातावरण से वंचित होते जा रहे हैं और हमारे वो संबंध जो हमें आपस में बांधे रखते थे, बड़ी तेजी से समाप्ति की ओर जा रहे हैं।आज हमें अपने निजी व्यवहार और जीवन शैली में आ गये बदलाव पर अत्यधिक विचार करने की तीव्र आवश्यकता है और इस काम में हमारी परम्पराओं की संस्कृति हमारी सहायता अच्छी तरह कर सकती है। अपने परिवारों के बीच प्रेम और सम्मान का वातावरण तथा परस्पर सद्भावना के निर्माण के लिए ऐसे ही कछ विचारों पर हम ध्यान केन्द्रित कर सकते हैं जो हमारी मदद हमेशा करते हैं।

1. सेवा: यह एक ऐसा संबोधन है जिसमे अपने कर्तव्य बोध के साथ समर्पण भी जुड़ा है। व्यक्तिगत रूप से मेरा अनुभव यही रहा है कि घर की नौकरानी द्वारा दी गई एक कप चाय…..और घर के परिवार के सदस्य पत्नी, पुत्राी और या पुत्रावधू द्वारा प्रस्तुत एक कप चाय………..मिठास का अंतर तो अनुभव हो ही जाता है। पहले वाली चाय में शायद केवल कर्तव्य बोध है जबकि दूसरी में कर्तव्य के साथ अनुराग भी बांध लेता है। यही भावना ही धीरे-धीरे आगे चलकर प्रेम और सम्मान में बदल जाती है।

2. परिवार कक्ष: हमारे घर में एक तो जगह ऐसी जरूर हो, जहां घर के सभी सदस्य मिल बैठकर टीवी देखें और आपसे अपने अनुभव और विचार सांझा करें। आजकल तो बड़े सुन्दर सुन्दर ड्राइंग रूम होते हैं, जो घरों में आने वाले मेहमानों का ही इंतजार करते हैं, परन्तु वहां घर-परिवार के लोग भी तो कभी-कभार ही दिखाई पड़ते हैं। वैसे मोबाईल पफोन पर व्यक्तिगत बातें करने के लिए बड़ा सुविधाजनक स्थान हेाता है – आपका ड्राइंग रूम….।साथ साथ बैठने बात करने के अवसर तो बहुत कम ही घर में मिलते हैं। हमको आपको, आजकल तो हर कोई अपने बैडरूम में टीवी से अपनी आंखें चिपकाए दिखता है…..। इन आधुनिक सुविधाओं ने तो खुशी के नाम पर हमारी पारिवारिक सुख शांति और सह अस्तित्व की भावना को ही ग्रहण लगा दिया है। अगर हम सब साथ बैठे होते तो हो सकता था कि सभी मिलकर किसी एक टीवी प्रोग्राम को देखने पर एकमत हो जाते। यह भी हो सकता था कि अपनी-अपनी पसंद का विवाद होने की स्थिति में समाधान के लिए घर की मुखिया की बात को अंतिम निर्णय मानकर सब साथ होते। हमारे अलग-अलग शयन कक्षों ने तो हमें इस हद तक बांट दिया है कि हमारे अंदर से सहनशीलता और दूसरे विचारों से सांमजस्य बनाने की क्षमता ही समाप्त होती जा रही है।

3. बैंक खाते: घर परिवार े सभी धन कमाने वाले सदस्यों ने अपने पूर्णतः व्यक्तिगत खाते खुलवा रखे हैं और उनमें आपस में समय पर खर्च न करने की होड़ सी लगी होती है। कोई किसी पर आश्रित नहीं है और यह उनकी पूर्ण स्वतन्त्रता है। इस पूर्ण स्वतन्त्रता ने घरों के अंदर की एकता को छिन्न भिन्न कर दिया है। वास्तव मे, आज तो नगरों घर है नहीं, ये तो सभी मकान है….फ्रलैट या पेइंग गेस्ट हाॅस्टल जैसी जगहे हैं…..।

आजकल के 20-30 साल के नौजवानों की घर की समझ को तो शायद आधुनिकता की नजर लग गई है। उन्हें पुरानी घर परम्परा के बारे में तो किसी ने बताया सिखाया नहीं और न ही उन्हें कुछ वैसा शहर में देखने को मिला। उनके लिए तो अपनी स्वतन्त्राता और निजता ही अधिक मायने रखती है। उनकी दुनिया बस उनके अपने दोस्तों तक है, बाकी सारे संबंध तो महत्वहीन या गौण हैं।

अभी हाल ही में, मैंने कुछ हफ्रतों का समय एक ग्रामीण परिवार के संग बिताया, जहां मुझे लगा कि मैं स्वर्ग में हूं भले ही वह एक गांव था। उस परिवार के मुखिया का सम्मान, उस घर के सभी सदस्य बिना कहे ही कर रहे थे। किसी को कुछ भी बताने या कहने की जरूरत ही नहीं थी। ‘घर की समझ’ के साथ वास्तव में पूरी तरह यही उचित वंशानुक्रम (वंश में श्रेष्ठता क्रम) का एक सवोत्तम उदाहरण था। अलग-अलग बेडरूमों या शयनकक्षों की उन लोगों के लिए, जिन्होंने पुरानी परम्पराओं का समय देखा है और घर परिवार का अर्थ सही मायने में जानते हैं उनकी इन मूल्यों के प्रति समाज को जागरूक करने की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। आज इस बात की जरूरत है कि स्कूल और घरों में बच्चों को इन जीवन मूल्यों को सिखाया जाये।

कुछ लोग कह सकते हैं कि सेवा, अनुक्रम, सम्मान आदि पुरातनपंथी विचार है, परन्तु आज इसी पुरातन की अति आवश्यकता है। अतः इससे पहले कि हम जीवन की अंधी दौड़ में बहुत दूर निकल जाएं, अच्छा होगा कि आ अब हम लौट चलें….।

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नगर निगम ने फरीदाबाद शहर को बना दिया कूड़े का ढेर – जसवंत पवार

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वैसे तो फरीदाबाद शहर को अब स्मार्ट सीटी का दर्जा प्राप्त हो चूका है, परन्तु शहर के सड़कों पर गंदगी के ढेर  फरीदाबाद प्रशासन और नगर को आइना दिखा रहे हैं

शहर के अलग अलग मुख्य चौराहों और सड़कों पर पढ़े कूड़े के ढेर को लेकर समाज सेवी जसवंत पवार ने फरीदाबाद प्रशासन और नगर निगम कमिश्नर से पूछा है कि एक तरफ भारत के प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी कहते हैं कि स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत मुहिम को पूरे देश में चला रहे हैं वही नगर निगम इस पर पानी फेरता दिख रहे हैं फरीदाबाद में आज सड़कों पर देखे तो गंदगी के ढेर लगे हुए हैं पूरे शहर को इन्होंने गंदगी का ढेर बना दिया है। जिसके चलते फरीदाबाद शहर अभी तक एक बार भी स्वछता सर्वेक्षण में अपनी कोई अहम् भूमिका अदा नहीं कर पा रहा,  अगर ऐसे ही चलता रहा तो हमारा फरीदाबाद शहर स्वच्छता सर्वे में फिर से फिसड्डी आएगा। साल 2021 में स्वछता सर्वेक्षण 1 मार्च से 28 मार्च तक किया जाना है जिसको लेकर लगता नहीं की जिला प्रसाशन व फरीदाबाद के नेता और मंत्री फरीदाबाद शहर की स्वछता को लेकर बिल्कुल भी चिंतित दिखाई नहीं पढ़ते है।

जसवन्त पंवार ने फरीदाबाद वासियों से अनुरोध और निवेदन किया है अगर हमें अपना शहर स्वच्छ और सुंदर बनाना है तो हम सबको मिलकर प्रयास करने होंगे जहां पर भी गंदगी के ढेर हैं आप वीडियो बनाएं सेल्फी ले फोटो खींचे और नेताओं और प्रशासन तक उसे पहुंचाएं, हमें जागरूक होना होगा तभी जाकर यह फरीदाबाद शहर हमारा स्वच्छ बन पाएगा। आप हमें इस नंबर पर वीडियो और फोटो भेज सकते हैं

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क्यों हर दो महीने में आता है बिजली का बिल?

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हम सभी अपने कुछ रोजमर्रा में प्रयोग होने वाली चीजों के बिलों का भुगतान हर महीने करते हैं। जैसे बैकों की किश्तंे, घर का किराया इत्यादि। लेकिन क्या आपने कभी इस बात पर गौर फरमाया है कि जब हर चीज का भुगतान हम महीने दर महीने करते हैं। तो बिजली के बिल का ही भुगतान हर दो महीने में क्यों?

इस पर बिजली निगम का कहना है कि बिलिंग प्रक्रिया से जुड़ी एक लागत होती है। जिसमें मीटर रीड़िंग की लागत, कम्प्यूटरीकृत प्रणाली में रीडिंग फीड़ करने की लागत, बिल जेनरेशन की लागत, प्रिंटिग और बिलों को वितरित करने की लागत आदि चीजें शामिल होती हैं। इन लागतों को कम करने के लिए बिलिंग की जाती हैं। इसलिए बिजली बिल 2 महीने में आता है।
फिलहाल बिजली निगम 0-50 यूनिट तक 1.45 रूपये प्रति यूनिट, 51-100 यूनिट तक 2.60 रूपये प्रति यूनिट चार्ज करता है।
आप यह अनुमान लगाइए कि यदि किसी छोटे परिवार की यूनिट 50 से कम आती है। तो उसका चार्ज 1.45 रूपये प्रति यूनिट होगा लेकिन जब बिल दो महीने में जारी होगा। तो उसका 100 यूनिट से उपर बिल आएगा। मतलब साफ है कि उसे प्रति यूनिट चार्ज 2.60 रूपये देना होगा । ऐसे में उस गरीब को सरकार की छूट का लाभ नहीं मिला लेकिन सरकार ने पूरी वाह-वाही लूट ली।
आप यह बताइए जिस घर में सदस्य कम है। तो उस घर की बिजली खपत भी कम होगी और बिल भी कम ही आएगा। मतलब साफ है उपयोग कम तो यूनिट भी कम। यदि बिजली बिल एक महीने में आता है तभी ही तो जनता को इसका लाभ मिलेगा।
लेकिन चूंकि बिल दो महीने में आता है इसलिए गरीब को या छोटे परिवार को महंगी बिजली प्रयोग करनी पड़ रही है।
एक तरफ बिजली निगम अपना फायदा देख रहा है। तो दूसरी तरफ सरकार सस्ती बिजली की घोषणा करके, एक राजनीतिक मुद्द्ा बना कर, जनता की वाह-वाही लूट रही है। लेकिन जनता को लाभ मिल ही नहीं रहा क्योंकि सरकार तो दो महीने में लोगों को बिल दे रही हैं। इसलिए जब महीने में एक बार बिल आएगा तभी आम जनता को लाभ प्राप्त होगा। सरकार कब तक जनता को अपने घोषणाओं के जाल में फंसाती रहेगी? कब जनता को अपनी दी हुई पूंजी का सही लाभ प्राप्त होगा?

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क्यों राहुल गांधी बिना किसी बात के भी फंस जाते हैं?

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आई ए एस अधिकारी टीना डाबी को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी एक बार फिर सोशल मीडिया में ट्रोल हो गए हैं। खबर बस इतनी है कि दलित समाज से आने वाली टीना मुस्लिम समाज से आने वाले अपने पति अतहर से तलाक ले रहीं हैं।

दिल्ली शहर की रहने वाली 24 वर्षीय टीना डाबी जो 2015 की सिविल परीक्षा में टाॅप करके आई ए एस अधिकारी बनी थी। उन्होंने कश्मीर के मटट्न नामक शहर में रहने वाले अतहर खान से शादी कर ली जो उसी परीक्षा में दूसरे स्थान पर था।
टीना पहली दलित महिला थी जिसने यूपीएससी की परीक्षा में टाॅप किया था।
टीना और अतहर की शादीशुदा जोड़ी को उनके विवाह के दौरान जय भीम और जय मीम की एकता, मुस्लमान और दलितों के बीच में सबधों की मिसाल बताया गया था। उस समय राहुल गांधी ने स्वंय अपने ट्वीटर अकांउट से ट्वीट करते हुए कहा था कि ये जोड़ी मिसाल कायम करेगी। यह हिंदू, मुस्लमानों की एकता का प्रतीक है।
लेकिन आपसी मतभेदों के कारण जयपुर के पारिवारिक न्यायालय में इस जोड़ी ने तलाक की अर्जी दाखिल की है। अब ये जोड़ी तलाक ले रही हैं और लोग राहुल गांधी को लानत दे रहे हैं ‘दिख गई सहजता। दिखा लिया भाईचारा।।‘
आज कांग्रेस की जो हालत है या राहुल गांधी की जो हालत है वो इस वजह से है क्योंकि राहुल ने हर मुद्दे में केवल जाति व धर्म का एंगल खोजा और उसका तुष्टीकरण किया। उन्होंने सर्व समाज से बातें करने में हमेशा परहेज किया। केवल धर्म और जातियों में खास दृष्टिकोण खोजते रहे।
अब तक देखने में आया है कि घटना किसी दलित के साथ हुई है तो वह एक्शन लंेगे और यदि वह दलित कांग्रेस शासित राज्य में है तो एक्शन नहीं लेंगे। उसी प्रकार कोई घटना मुस्लिम के साथ है तो वह आवाज उठाएंगे और यदि वह मुस्लिम अपने शासित राज्य में है तो वो आवाज दबा दंेगे।
इसी कारण से कांग्रेस की हालत यह हो गई है कि लोग उन्हें धर्म और जाति का मुद्दा उठते ही लोग लानत देने लगते हैं।

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