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वाह ज़िन्दगी

हीटर का इस्तेमाल करने वाले पढ़ें ये खबर

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ठंड से बचने के लिए अधिकांश लोग अपने घरों या कार्यालयों में हीटर चलाते हैं| ऐसे में इस मौसम में हवा में नमी का स्तर वैसे ही कम होता है, जो हीटर चलाने से और कम हो जाता है, जिससे आंखों की नमी और उड़ जाती है| यदि आप गर्म स्थानों पर समय बिताते हैं तो सर्दियों के मौसम में कम नमी के कारण आंखों में सूखापन का सामना करना पड़ सकता है|

सर्दियों में होती है आंखों में खुजली तो अपनाएं ये टिप्स

लेकिन फिर भी अधिक सर्दी के कारण गर्म स्थानों पर समय बिताते हैं, तो हवा में कुछ नमी वापस जोड़ने के लिए एक ह्यूमिडिफायर का उपयोग करें| बहुत सारे तरल पदार्थ पिएं जिससे कि आपके शरीर को हाइड्रेटेड रखने से आपकी आंखों में नमी बनाए रखने में मदद मिलेगी| अपने चेहरे पर सीधे हीटर की गर्मी ना पड़ने दें, क्योंकि इससे आपकी आंखों की नमी सूख सकती है| इसके अलावा, कार में, हीट वेंट्स को शरीर के निचले हिस्से की तरफ कर के चलाया जाना चाहिए|

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वाह ज़िन्दगी

सिद्धदाता आश्रम में डेल्टा प्लस वायरस से मुक्ति के लिए यज्ञ

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फोटो – श्री सिद्धदाता आश्रम में नए डेल्टा प्लस वायरस के खात्मे के लिए यज्ञ करते जगदगुरु स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य जी महाराज।

जगदगुरु स्वामी श्री पुरुषोत्तमाचार्य जी महाराज ने किया जनकल्याण के लिए यज्ञ

फरीदाबाद। सूरजकुंड रोड स्थित श्री लक्ष्मीनाराण दिव्यधाम (सिद्धदाता आश्रम) में अधिष्ठाता श्रीमद जगदगुरु रामानुजाचार्य स्वामी श्री पुरुषोत्तमाचार्य जी महाराज ने डेल्टा प्लस वायरस से मुक्ति के लिए यज्ञ किया। उन्होंने कहा कि इस यज्ञ के माध्यम से उन्होंने परमपिता परमात्मा से सभी जीवों को रोगमुक्ति की भी प्रार्थना की।

डेल्टा प्लस वायरस का मामला फरीदाबाद में भी उजागर होने को स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य जी महाराज ने कड़ाई से लिया है। उन्होंने आश्रम में इस वायरस के खात्मे के लिए विशेष यज्ञ किया। करीब 24 घंटे चले इस यज्ञ में दर्जनों पुरोहितों के साथ उन्होंने समिधा डाली। स्वामी जी ने बताया कि वैदिक सनातन धर्म में प्राकृतिक आपदाओं से मुक्ति के लिए अनेक उपाय मौजूद हैं। जिनका प्रयोग कर हम सर्वसमाज को रोगमुक्त और संपन्न बनाए रख सकते हैं।

गौरतलब है कि इस कोरोना काल में श्री सिद्धदाता आश्रम की ओर से समाज का भरसक सहयोग किया गया। इसमें प्रशासन के साथ मिलकर और आश्रम में भोजन का वितरण करना, वैक्सीनेशन कैंप का आयोजन करना व अन्य जरूरी सामान को बांटना आदि शामिल हैं। इसी कड़ी में आज का यह यज्ञ भी महत्वपूर्ण किरदार निभाएगा।

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वाह ज़िन्दगी

आपातकाल में मकरसंक्रांति कैसे मनाएं ?

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‘कोरोना की पृष्ठभूमि पर गत कुछ महीनों से त्योहार-उत्सव मनाने अथवा व्रतों का पालन करने हेतु कुछ प्रतिबंध थे । यद्यपि कोरोना की परिस्थिति अभी तक पूर्णतः समाप्त नहीं हुई है, तथापि वह धीरे-धीरे पूर्ववत हो रही है । ऐसे समय त्योहार मनाते समय आगामी सूत्र ध्यान में रखें ।

  1. त्योहार मनाने के सर्व आचार, (उदा. हलदी-कुमकुम समारोह, तिलगुड देना आदि) अपने स्थान की स्थानीय परिस्थिति देखकर शासन-प्रशासन द्वारा कोरोना से संबंधित नियमों का पालन कर मनाएं ।
  2. हलदी-कुमकुम का कार्यक्रम आयोजित करते समय एक ही समय पर सर्व महिलाआें को आमंत्रित न करें, अपितु ४-४ के गुट में 15-20 मिनट के अंतर से आमंत्रित करें ।3. तिलगुड का लेन-देन सीधे न करते हुए छोटे लिफाफे में डालकर उसका लेन-देन करें ।
  3. आपस में मिलते अथवा बोलते समय मास्क का उपयोग करें ।5. किसी भी त्योहार को मनाने का उद्देश्य स्वयं में सत्त्वगुण की वृद्धि करना होता है । इसलिए आपातकालीन परिस्थिति के कारण प्रथा के अनुसार त्योहार-उत्सव मनाने में मर्यादाएं हैं, तथापि इस काल में अधिकाधिक समय ईश्‍वर का स्मरण, नामजप, उपासना आदि करने तथा सत्त्वगुण बढाने का प्रयास करने पर ही वास्तविक रूप से त्योहार मनाना होगा ।

मकरसंक्रांति से संबंधित आध्यात्मिक विवेचन

त्योहार, उत्सव और व्रतों को अध्यात्मशास्त्रीय आधार होता है । इसलिए उन्हें मनाते समय उनमें से चैतन्य की निर्मिति होती है तथा उसके द्वारा साधारण मनुष्य को भी ईश्‍वर की ओर जाने में सहायता मिलती है । ऐसे महत्त्वपूर्ण त्योहार मनाने के पीछे का अध्यात्मशास्त्र जानकर उन्हें मनाने से उसकी फलोत्पत्ति अधिक होती है । इसलिए यहां संक्रांत और उसे मनाने के विविध कृत्य और उनका अध्यात्मशास्त्र यहां दे रहे हैं ।

  1. उत्तरायण और दक्षिणायन :

इस दिन सूर्य का मकर राशि में संक्रमण होता है । सूर्यभ्रमण के कारण होनेवाले अंतर की पूर्ति करने हेतु प्रत्येक अस्सी वर्ष में संक्रांति का दिन एक दिन आगे बढ जाता है । इस दिन सूर्य का उत्तरायण आरंभ होता है । कर्क संक्रांति से मकर संक्रांति तक के काल को ‘दक्षिणायन’ कहते हैं । जिस व्यक्ति की उत्तरायण में मृत्यु होती है, उसकी अपेक्षा दक्षिणायन में मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति के लिए, दक्षिण (यम) लोक में जाने की संभावना अधिक होती है ।

  1. संक्रांति का महत्त्व : इस काल में रज-सत्त्वात्मक तरंगों की मात्रा अधिक होने के कारण यह साधना करनेवालों के लिए पोषक होता है ।
  2. तिल का उपयोग : संक्रांति पर तिल का अनेक ढंग से उपयोग करते हैं, उदाहरणार्थ तिलयुक्त जल से स्नान कर तिल के लड्डू खाना एवं दूसरों को देना, ब्राह्मणों को तिलदान, शिवमंदिर में तिल के तेल से दीप जलाना, पितृश्राद्ध करना (इसमें तिलांजलि देते हैं) श्राद्ध में तिलका उपयोग करने से असुर इत्यादि श्राद्ध में विघ्न नहीं डालते । आयुर्वेदानुसार सर्दी के दिनों में आनेवाली संक्रांति पर तिल खाना लाभदायक होता है । अध्यात्मानुसार तिल में किसी भी अन्य तेल की अपेक्षा सत्त्वतरंगे ग्रहण करने की क्षमता अधिक होती है तथा सूर्य के इस संक्रमण काल में साधना अच्छी होने के लिए तिल पोषक सिद्ध होते हैं ।

3 अ. तिलगुड का महत्त्व : तिल में सत्त्वतरंगें ग्रहण करने की क्षमता अधिक होती है । इसलिए तिलगुड का सेवन करने से अंतःशुद्धि होती है और साधना अच्छी होने हेतु सहायक होते हैं । तिलगुड के दानों में घर्षण होने से सात्त्विकता का आदान-प्रदान होता है ।

4 अ. हलदी-कुमकुम लगाना : हलदी-कुमकुम लगाने से सुहागिन स्त्रियों में स्थित श्री दुर्गादेवी का सुप्त तत्त्व जागृत होकर वह हलदी-कुमकुम लगानेवाली सुहागिन का कल्याण करती है ।

4 आ. इत्र लगाना : इत्र से प्रक्षेपित होनेवाले गंध कणों के कारण देवता का तत्त्व प्रसन्न होकर उस सुहागिन स्त्री के लिए न्यून अवधि में कार्य करता है । (उस सुहागिन का कल्याण करता है ।)

4 इ. गुलाबजल छिडकना : गुलाबजल से प्रक्षेपित होनेवाली सुगंधित तरंगों के कारण देवता की तरंगे कार्यरत होकर वातावरण की शुद्धि होती है और उपचार करनेवाली सुहागिन स्त्री को कार्यरत देवता के सगुण तत्त्व का अधिक लाभ मिलता है ।

4 ई. गोद भरना : गोद भरना अर्थात ब्रह्मांड में कार्यरत श्री दुर्गादेवी की इच्छाशक्ति को आवाहन करना । गोद भरने की प्रक्रिया से ब्रह्मांड में स्थित श्री दुर्गादेवीची इच्छाशक्ति कार्यरत होने से गोद भरनेवाले जीव की अपेक्षित इच्छा पूर्ण होती है ।  

4 उ. उपायन देना : उपायन देते समय सदैव आंचल के छोर से उपायन को आधार दिया जाता है । तत्पश्‍चात वह दिया जाता है । ‘उपायन देना’ अर्थात तन, मन एवं धन से दूसरे जीव में विद्यमान देवत्व की शरण में जाना । आंचल के छोर का आधार देने का अर्थ है, शरीर पर धारण किए हुए वस्त्र की आसक्ति का त्याग कर देहबुद्धि का त्याग करना सिखाना । संक्रांति-काल साधना के लिए पोषक होता है । अतएव इस काल में दिए जानेवाले उपायन सेे देवता की कृपा होती है और जीव को इच्छित फलप्राप्ति होती है ।

4 उ 1. उपायन में क्या दें ? : आजकल साबुन, प्लास्टिक की वस्तुएं जैसी अधार्मिक सामग्री उपायन देने की अनुचित प्रथा है ।

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वाह ज़िन्दगी

तुलाराशि के लोगों के लिए कैसा होगा बुध

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तुला राशि में बुध का गोचर

बुध को व्यापार, बुद्धि, वाणी आदि का कारक माना गया है| विशेष बात ये है कि तुला राशि में बुध वक्री हो रहा है| बुध का वक्री होना ज्योतिष शास्त्र में अति महत्वपूर्ण माना जा रहा है|वैसे तो बुध का यह गोचर सभी राशियों को प्रभावित करेगा लेकिन तुला राशि के जातकों पर इसका विशेष प्रभाव रहेगा|क्योंकि तुला राशि में बुध का गोचर हो रहा है|तुला राशि में बुध बारहवें और नवें भाव का स्वामी माना गया है| बुध का गोचर तुला राशि के प्रथम भाव में हो रहा है|जन्म कुंडली के पहले भाव से व्यक्तित्व, शरीर, आदि का विचार किया जाता|

तुला राशिफल
तुला राशि में बुध के आने से कई मामलों में अच्छे परिणाम देखने को मिलेंगे|बुध का यह गोचर तुला राशि के जातकों को जॉब और व्यापार में अच्छे परिणाम देगा|लेकिन छोटी छोटी चीजों को पाने के लिए भी अधिक परिश्रम करना पड़ेगा|वहीं उन कार्यों को करने में अधिक रूचि और समय खर्च करेंगे जिन्हें आप पहले ही कर चुके हैं|इस दौरान मानसिक तनाव भी हो सकता है|प्यार के मामले में अधिक भावुक रहना आपके लिए हितकर साबित नहीं होगा|विद्यार्थियों के लिए यह समय अच्छा रहेगा|इस दौरान यात्राएं भी कर सकते हैं|परिवार के साथ अच्छा समय गुजरेगा| भगवान गणेश की पूजा करने से लाभ प्राप्त होगा|

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