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वाह ज़िन्दगी

नवरात्रोत्सव में धर्मशास्त्रानुसार कैसे करें देवीकी उपासना 

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whitemirchi.com | Faridabad
आश्‍विन शुक्ल प्रतिपदासे नवरात्रोत्सव आरंभ होता है । इस वर्ष नवरात्रोत्सव १३ अक्टूबर, २०१५ से आरंभ हो रहा है । इस काल मेंनवरात्रोत्सवमें घटस्थापना करते हैं । अखंड दीपके माध्यमसे नौ दिन श्री दुर्गादेवीकी पूजा करना अर्थात नवरात्रोत्सव मनाना । नवरात्रिके कालमें श्री दुर्गादेवीका तत्त्व अधिक कार्यरत होता है । शास्त्र समझकर देवीकी उपासना करनेसे हमें दुर्गातत्त्वका अधिकाधिक लाभ होता है । इसी दृष्टिसे भक्तगण इस लेखका अभ्यास करें।

श्री दुर्गादेवीकी विशेषताएं

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके । शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते ।।

सर्व मंगलकारी वस्तुओं में विद्यमान मांगल्य रूप देवी, कल्याणदायिनी, सर्व पुरुषार्थों को साध्य कराने वाली, शरणागतों की रक्षा करने वाली देवी, त्रिनयना, गौरी, नारायणी ! आपको मेरा प्रणाम । श्री दुर्गादेवीके अतुलनीय गुणोंका परिचय इस श्लोकसे होता है । जीवन को परिपूर्ण बनाने हेतु आवश्यक सर्व विषयों का साक्षात प्रतीक हैं, आदिशक्ति  श्री दुर्गादेवी । श्री दुर्गादेवीको जगत्जननी कहा गया है । जगत्जननी अर्थात सबकी माता ।

नवरात्रिमें देवीके कौनसे रूपोंकी उपासना करें ?
महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती, देवीके तीन प्रमुख रूप हैं । एक मतानुसार नवरात्रिके पहले तीन दिन तमोगुण कम करने हेतु महाकाली की, अगले तीन दिन सत्त्वगुण बढाने हेतु महालक्ष्मी की एवं अंतिम तीन दिन साधना तीव्र होने हेतु सत्त्वगुणी महासरस्वती की पूजा करते हैं ।

व्रत करनेकी पद्धति
अनेक परिवारोंमें यह व्रत कुलाचारके स्वरूपमें किया जाता है । आश्विन की शुक्ल प्रतिपदासे इस व्रतका प्रारंभ होता है ।

१. घरके किसी पवित्र स्थानपर एक वेदी तैयार कर, उसपर सिंहारूढ अष्टभुजा देवीकी और नवार्णव यंत्रकी स्थापना की जाती है । यंत्रके समीप घटस्थापना कर, कलश एवं देवी का यथाविधि पूजन किया जाता है ।

२. नवरात्रि महोत्सवमें कुलाचारानुसार घटस्थापना एवं मालाबंधन करें । खेत की मिट्टी लाकर दो पोर चौडा चौकोर स्थान बनाकर, उसमें पांच या सात प्रकारके धान बोएं । इसमें (पांच अथवा) सप्तधान्य रखें । जौ, गेहूं, तिल, मूंग, चेना, सांवां, चने सप्तधान्य हैं ।
३. जल, गंध (चंदनका लेप), पुष्प, दूब, अक्षत, सुपारी, पंचपल्लव, पंचरत्न एवं स्वर्णमुद्रा या सिक्के इत्यादि वस्तुएं मिट्टी या तांबेके कलशमें रखें ।
४. सप्तधान एवं कलश (वरुण) स्थापनाके वैदिक मंत्र यदि न आते हों, तो पुराणोक्त मंत्रका उच्चारण किया जा सकता है । यदि यह भी संभव न हो, तो उन वस्तुओं का नाम लेते हुए ‘समर्पयामि’ बोलते हुए नाममंत्र का विनियोग करें । माला इस प्रकार बांधें, कि वह कलश के भीतर पहुंचे ।
५. प्रतिदिन कुंवारी कन्या की पूजा कर उसे भोजन करवाएं ।
६. ‘नवरात्रों का व्रत करनेवाले अपनी आर्थिक क्षमता एवं सामर्थ्य के अनुसार विविध कार्यक्रम करते हैं, जैसे अखंड दीपप्रज्वलन, उस देवताका माहात्म्यपठन (चंडीपाठ), सप्तशतीपाठ, देवीभागवत, ब्रह्मांडपुराण के ललितोपाख्यान का श्रवण, ललितापूजन, सरस्वतीपूजन, उपवास, जागरण इत्यादि ।
७. यद्यपि भक्तका उपवास हो, फिर भी देवता को हमेशाकी तरह अन्न का नैवेद्य दिखाना पडता है ।
८. व्रतके दौरान उपासक उत्कृष्ट आचरण का एक अंग मानकर दाढी न बनाना, ब्रह्मचर्य का पालन, पलंग एवं बिस्तर पर न सोना, गांवकी सीमा न लांघना, चप्पल एवं जूतों का प्रयोग न करना इत्यादि का पालन करता है ।
९. नवरात्रि की संख्या पर जोर देकर कुछ लोग अंतिम दिन भी नवरात्रि रखते हैं; परंतु शास्त्रानुसार अंतिम दिन नवरात्रि समापन आवश्यक है । इस दिन समाराधना (भोजनप्रसाद) उपरांत, समय हो तो उसी दिन सर्व देवताओं का अभिषेक एवं षोडशोपचार पूजा करें । समय न हो, तो अगले दिन सर्व देवताओं का पूजाभिषेक करें ।
१०. देवी की मूर्ति का विसर्जन करते समय बोए हुए धान के पौधे देवी को समर्पित किए जाते हैं । उन पौधों को ‘शाकंभरीदेवी’का स्वरूप मानकर स्त्रियाँ अपने सिरपर धारण कर चलती हैं और फिर उसे विसर्जित करती हैं ।
११. स्थापना एवं समापन के समय देवोंका ‘उद्वार्जन (सुगंधी द्रव्योंसे स्वच्छ करना, उबटन लगाना)’ करें । उद्वार्जन हेतु सदैव की भांति नींबू, भस्म इत्यादि का प्रयोग करें । रंगोली, बर्तन मांजने के चूर्ण का प्रयोग न करें ।
नवरात्रोत्सव के काल में श्री दुर्गादेवी का नामजप करना
नामजप कलियुग की सर्वश्रेष्ठ तथा सरल साधना है । नामजप द्वारा देवी को निरंतर पुकारने से वे तुरंत हमारी सुनती हैं । नवरात्रि में अधिक मात्रा में कार्यरत श्री दुर्गादेवी का तत्त्व ग्रहण हो, इसलिए इस कालमें ‘ॐ श्री दुर्गादेव्यै नमः ।’ नामजप अधिकाधिक करें ।
नवरात्रि में देवी को की जानेवाली प्रार्थना
नवरात्रिमें हम अपनी विविध कामनाओंकी पूर्तिके लिए देवीसे प्रार्थना करते हैं; परंतु वर्तमान कलियुग में महिषासुरमर्दिनी से कौन-सी प्रार्थना करना उपयुक्त है? देवीने महिषासुरका वध किया । आज अधिकांश लोगों के हृदय में षड्रिपुरूपी महिषासुर बसते हैं । आसुरी बंधनों से मुक्त होने के लिए नवरात्रि में आदिशक्ति  की शरण जाकर उनसे प्रार्थना करें, – ‘हे देवी, आप हमें बल दें । आपकी शक्ति से हम आसुरी वृत्ति का नाश कर पाएं ।’
नवरात्रि की नौ रातें प्रतिदिन गरबा खेलना
‘गरबा खेलने’को ही हिन्दू धर्ममें तालियोंके लयबद्ध स्वर में देवी का भक्तिरसपूर्ण गुणगानात्मक भजन कहते हैं । गरबा खेलना, अर्थात तालियों की नादात्मक सगुण उपासना से श्री दुर्गादेवी को ध्यान से जागृत कर, उन्हें ब्रह्मांड के लिए कार्य करने हेतु मारक रूप धारण करने का आवाहन ।
गरबा दो तालियों से खेलना चाहिए या तीन तालियों से ?
नवरात्रि में श्री दुर्गादेवी का मारक तत्त्व उत्तरोत्तर जागृत होता है । ईश्वर की तीन प्रमुख कलाएं हैं – ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश । इन तीनों कलाओं के स्तर पर देवी का मारक रूप जागृत होने हेतु, तीन बार तालियां बजाकर ब्रह्मांडांतर्गत देवी की शक्तिरूपी संकल्पशक्ति कार्यरत की जाती है । इसलिए तीन तालियों की लयबद्ध हलचल से देवी का गुणगान करना अधिक इष्ट एवं फलदायी होता है ।
नवरात्रि में सरस्वतीपूजन (अष्टमी एवं नवमी)
विजयादशमी से एक दिन पूर्व तथा विजयादशमी पर भी सरस्वतीपूजन प्रधानता से करें । सरस्वती का प्रत्यक्ष आवाहनकाल आश्विन शुक्ल अष्टमीपर मनाया जाता है; नवमीपर देवी के मूर्तस्वरूपकी ओर उपासकका आकर्षण बढता है । विजयादशमीपर सरस्वती विसर्जनकी विधि संपन्न की जाती है । अष्टमीसे विजयादशमीतक, शक्तिरूप सुशोभित होता है । सरस्वतीकी तरंगोंसे उपासककी आत्मशक्ति जागृत होती है और उसे आनंदकी अनुभूति होती है ।
(संदर्भ : सनातन संस्था-निर्मित ग्रंथ ‘शक्ति ’ एवं लघुग्रंथ ‘देवीपूजनसे संबंधित कृत्योंका अध्यात्मशास्त्र’)

source : www.sanatan.org स्थानीय संपर्क क्र. : ९९९०८५१५७०, वाराणसी : (०५४२) २५९ ०२२३

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आपातकाल में मकरसंक्रांति कैसे मनाएं ?

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‘कोरोना की पृष्ठभूमि पर गत कुछ महीनों से त्योहार-उत्सव मनाने अथवा व्रतों का पालन करने हेतु कुछ प्रतिबंध थे । यद्यपि कोरोना की परिस्थिति अभी तक पूर्णतः समाप्त नहीं हुई है, तथापि वह धीरे-धीरे पूर्ववत हो रही है । ऐसे समय त्योहार मनाते समय आगामी सूत्र ध्यान में रखें ।

  1. त्योहार मनाने के सर्व आचार, (उदा. हलदी-कुमकुम समारोह, तिलगुड देना आदि) अपने स्थान की स्थानीय परिस्थिति देखकर शासन-प्रशासन द्वारा कोरोना से संबंधित नियमों का पालन कर मनाएं ।
  2. हलदी-कुमकुम का कार्यक्रम आयोजित करते समय एक ही समय पर सर्व महिलाआें को आमंत्रित न करें, अपितु ४-४ के गुट में 15-20 मिनट के अंतर से आमंत्रित करें ।3. तिलगुड का लेन-देन सीधे न करते हुए छोटे लिफाफे में डालकर उसका लेन-देन करें ।
  3. आपस में मिलते अथवा बोलते समय मास्क का उपयोग करें ।5. किसी भी त्योहार को मनाने का उद्देश्य स्वयं में सत्त्वगुण की वृद्धि करना होता है । इसलिए आपातकालीन परिस्थिति के कारण प्रथा के अनुसार त्योहार-उत्सव मनाने में मर्यादाएं हैं, तथापि इस काल में अधिकाधिक समय ईश्‍वर का स्मरण, नामजप, उपासना आदि करने तथा सत्त्वगुण बढाने का प्रयास करने पर ही वास्तविक रूप से त्योहार मनाना होगा ।

मकरसंक्रांति से संबंधित आध्यात्मिक विवेचन

त्योहार, उत्सव और व्रतों को अध्यात्मशास्त्रीय आधार होता है । इसलिए उन्हें मनाते समय उनमें से चैतन्य की निर्मिति होती है तथा उसके द्वारा साधारण मनुष्य को भी ईश्‍वर की ओर जाने में सहायता मिलती है । ऐसे महत्त्वपूर्ण त्योहार मनाने के पीछे का अध्यात्मशास्त्र जानकर उन्हें मनाने से उसकी फलोत्पत्ति अधिक होती है । इसलिए यहां संक्रांत और उसे मनाने के विविध कृत्य और उनका अध्यात्मशास्त्र यहां दे रहे हैं ।

  1. उत्तरायण और दक्षिणायन :

इस दिन सूर्य का मकर राशि में संक्रमण होता है । सूर्यभ्रमण के कारण होनेवाले अंतर की पूर्ति करने हेतु प्रत्येक अस्सी वर्ष में संक्रांति का दिन एक दिन आगे बढ जाता है । इस दिन सूर्य का उत्तरायण आरंभ होता है । कर्क संक्रांति से मकर संक्रांति तक के काल को ‘दक्षिणायन’ कहते हैं । जिस व्यक्ति की उत्तरायण में मृत्यु होती है, उसकी अपेक्षा दक्षिणायन में मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति के लिए, दक्षिण (यम) लोक में जाने की संभावना अधिक होती है ।

  1. संक्रांति का महत्त्व : इस काल में रज-सत्त्वात्मक तरंगों की मात्रा अधिक होने के कारण यह साधना करनेवालों के लिए पोषक होता है ।
  2. तिल का उपयोग : संक्रांति पर तिल का अनेक ढंग से उपयोग करते हैं, उदाहरणार्थ तिलयुक्त जल से स्नान कर तिल के लड्डू खाना एवं दूसरों को देना, ब्राह्मणों को तिलदान, शिवमंदिर में तिल के तेल से दीप जलाना, पितृश्राद्ध करना (इसमें तिलांजलि देते हैं) श्राद्ध में तिलका उपयोग करने से असुर इत्यादि श्राद्ध में विघ्न नहीं डालते । आयुर्वेदानुसार सर्दी के दिनों में आनेवाली संक्रांति पर तिल खाना लाभदायक होता है । अध्यात्मानुसार तिल में किसी भी अन्य तेल की अपेक्षा सत्त्वतरंगे ग्रहण करने की क्षमता अधिक होती है तथा सूर्य के इस संक्रमण काल में साधना अच्छी होने के लिए तिल पोषक सिद्ध होते हैं ।

3 अ. तिलगुड का महत्त्व : तिल में सत्त्वतरंगें ग्रहण करने की क्षमता अधिक होती है । इसलिए तिलगुड का सेवन करने से अंतःशुद्धि होती है और साधना अच्छी होने हेतु सहायक होते हैं । तिलगुड के दानों में घर्षण होने से सात्त्विकता का आदान-प्रदान होता है ।

4 अ. हलदी-कुमकुम लगाना : हलदी-कुमकुम लगाने से सुहागिन स्त्रियों में स्थित श्री दुर्गादेवी का सुप्त तत्त्व जागृत होकर वह हलदी-कुमकुम लगानेवाली सुहागिन का कल्याण करती है ।

4 आ. इत्र लगाना : इत्र से प्रक्षेपित होनेवाले गंध कणों के कारण देवता का तत्त्व प्रसन्न होकर उस सुहागिन स्त्री के लिए न्यून अवधि में कार्य करता है । (उस सुहागिन का कल्याण करता है ।)

4 इ. गुलाबजल छिडकना : गुलाबजल से प्रक्षेपित होनेवाली सुगंधित तरंगों के कारण देवता की तरंगे कार्यरत होकर वातावरण की शुद्धि होती है और उपचार करनेवाली सुहागिन स्त्री को कार्यरत देवता के सगुण तत्त्व का अधिक लाभ मिलता है ।

4 ई. गोद भरना : गोद भरना अर्थात ब्रह्मांड में कार्यरत श्री दुर्गादेवी की इच्छाशक्ति को आवाहन करना । गोद भरने की प्रक्रिया से ब्रह्मांड में स्थित श्री दुर्गादेवीची इच्छाशक्ति कार्यरत होने से गोद भरनेवाले जीव की अपेक्षित इच्छा पूर्ण होती है ।  

4 उ. उपायन देना : उपायन देते समय सदैव आंचल के छोर से उपायन को आधार दिया जाता है । तत्पश्‍चात वह दिया जाता है । ‘उपायन देना’ अर्थात तन, मन एवं धन से दूसरे जीव में विद्यमान देवत्व की शरण में जाना । आंचल के छोर का आधार देने का अर्थ है, शरीर पर धारण किए हुए वस्त्र की आसक्ति का त्याग कर देहबुद्धि का त्याग करना सिखाना । संक्रांति-काल साधना के लिए पोषक होता है । अतएव इस काल में दिए जानेवाले उपायन सेे देवता की कृपा होती है और जीव को इच्छित फलप्राप्ति होती है ।

4 उ 1. उपायन में क्या दें ? : आजकल साबुन, प्लास्टिक की वस्तुएं जैसी अधार्मिक सामग्री उपायन देने की अनुचित प्रथा है ।

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तुलाराशि के लोगों के लिए कैसा होगा बुध

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तुला राशि में बुध का गोचर

बुध को व्यापार, बुद्धि, वाणी आदि का कारक माना गया है| विशेष बात ये है कि तुला राशि में बुध वक्री हो रहा है| बुध का वक्री होना ज्योतिष शास्त्र में अति महत्वपूर्ण माना जा रहा है|वैसे तो बुध का यह गोचर सभी राशियों को प्रभावित करेगा लेकिन तुला राशि के जातकों पर इसका विशेष प्रभाव रहेगा|क्योंकि तुला राशि में बुध का गोचर हो रहा है|तुला राशि में बुध बारहवें और नवें भाव का स्वामी माना गया है| बुध का गोचर तुला राशि के प्रथम भाव में हो रहा है|जन्म कुंडली के पहले भाव से व्यक्तित्व, शरीर, आदि का विचार किया जाता|

तुला राशिफल
तुला राशि में बुध के आने से कई मामलों में अच्छे परिणाम देखने को मिलेंगे|बुध का यह गोचर तुला राशि के जातकों को जॉब और व्यापार में अच्छे परिणाम देगा|लेकिन छोटी छोटी चीजों को पाने के लिए भी अधिक परिश्रम करना पड़ेगा|वहीं उन कार्यों को करने में अधिक रूचि और समय खर्च करेंगे जिन्हें आप पहले ही कर चुके हैं|इस दौरान मानसिक तनाव भी हो सकता है|प्यार के मामले में अधिक भावुक रहना आपके लिए हितकर साबित नहीं होगा|विद्यार्थियों के लिए यह समय अच्छा रहेगा|इस दौरान यात्राएं भी कर सकते हैं|परिवार के साथ अच्छा समय गुजरेगा| भगवान गणेश की पूजा करने से लाभ प्राप्त होगा|

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वाह ज़िन्दगी

आज की कुंभ राशि

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कुंभ राशि में धन लाभ: लेन-देन और निवेश में थोड़ी सावधानी जरूर रखें। कोई भरोसेमंद इंसान भी आपके साथ धोखा कर सकता है।

कुंभ राशि में परिवार और मित्र : घरेलू जीवन के लिए यह समय थोड़ा संघर्षमय हो सकता है। किसी भी विवाद में पड़ने से बचना आपके लिए बेहतर होगा।

कुंभ राशि में रिश्ते और प्यार : आपको अपने जीवनसाथी के साथ तालमेल बिठाकर चलना होगा। प्रेम प्रसंगों के लिए यह समय काफी अच्छा साबित हो सकता है। इस समय आपके दोस्तों की संख्या में बढ़ोत्तरी होगी।

कुंभ राशि में स्वास्थ्य : सेहत शानदार रहेगी। बस तली-भुनी व अत्याधिक मिर्च-मसाले युक्त भोजन को त्यागना ही आपके लिए बेहतर होगा।

आपकी कार्यक्षमता में वृद्धि होगी। आप जमकर परिश्रम करेंगे व विरोधी-जन भी आपके सामने हार मान जाएंगे। उच्च अधिकारियों की कृपा से आपको नौकरी में कोई बड़ा लाभ मिल सकता है।

कुंभ राशि में बिज़नेस/स्टॉक/प्रॉपर्टी :शेयर बाजार में निवेश करना किसी भी सूरत में सही नहीं होगा। पेय पदार्थ व होटल-रेस्ट्रोरेंट आदि कार्यों से जुड़े कारोबारी लाभ उठा सकते हैं।

शुभ रंग: नीला

नीला रंग आज आपके लिए लकी साबित होगा। यह रंग आपकी किस्मत बदल सकता है। लाल रंग से बचें, यह रुकावटें पैदा कर सकता है।

शुभ अंक: 9

आज अंक 4 आपके लिए शुभ है। आज करियर से जुड़े फैसले लेने में किसी बुजुर्ग की राय आपके बहुत काम आ सकती है।

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