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वाह ज़िन्दगी

जगन्नाथ पुरी में भक्त तुलसीदास…

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पुज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान श्रीराम के एकान्तिक भक्त थे। वह अपने इष्ट के पक्के थे।गीता में कर्णित “यो माम् पश्यति सर्वत सर्व च मयि पश्यति” के द्रढ़ अनुआयी थे। बाल्यकाल से माता का विछोह हो गया था। दाई माँ भी उनका लालन पालन अधिक दिन न कर सकी वह भी चल बसी। माता पिता की छत्र छाया के बिना इनाथ बालक दर-दर भटकने लगा। जब संसार ठुकरा देता है तो सर्व शक्तिमान ईश्वर उसे अपनी छत्र छाया में लेता है। परम गुरू नर हरि दास को भगवान शंकर से चित्रकूट में आदेश मिला कि राजापुर जाकर अवतार उस अनाथ बालक का लालन पालन करो और मेरे द्वारा कही गई राम कथा सुना कर भविष्य के लिए उसका मार्ग दर्शन करो। तदुपरान्त योजनाअनुसार अनाथ रामबोला को सदगुरू का आश्रय प्राप्त हो गया। सदगुरू से ज्ञान प्राप्त करने  के पश्चात् उसे तुलसीदास नाम की प्राप्ति हुई। गृहस्थी का सुख मिला और फिर जीवन में एक अदभुत मोड़ आया। भोग मार्ग छोड़ कर योग मार्ग से आगे बढ़े। राम-दर्शन की प्रबल लालसा अन्तर में उद्वेलित होने लगी। राम नाम का आश्रय ही था। तीर्थटन प्रारम्भ हुआ। इष्ट की खोज में बेचैनी बढ़ने लगी। इष्ट एक था आदर सबका था। उन्होने अपनी जीभ को हरि हलधर को रकार तथा मकार के रूप में देखा। तीर्थों में भ्रमण करते हुए उन्होनें सुना कि स्वामी रामानन्दाचार्य को जगन्नाथपुरी जाने का मन बना लिया। आवा-गमन के साधनों के आभाव में पुरी पहुँचने में काफी समय लग गया था। भीड़ को चीरते हुए श्री मंदिर में प्रविष्ट हुए महाप्रभु जगन्नाथ का दर्शन करते ही ये मन में विचार आया कि वाल्मीकि रामायण में तो मैनें पढ़ था-  आराध्य जगन्नाथ इक्षाकु-कुल दैवतम्”  पर यह क्या? हस्त पाद विहिन देव तो हमारा इष्ट नहीं हो सकता है। अन्य मनस्क भाव से वह यथाशीघ्र मन्दिर परिसर से बाहर निकलकर कर कुछ दूर जाकर एक वृक्ष के तले बैठ कर विचार मग्न हो गए। हमारा इतनी दूर आना व्यर्थ ही सिद्ध हुआ। बार-बार ये विचार अंतर मे घिमड़ रहे थे क्या गोलाकार नैनों वाला हस्त पाद विहिन दारू देव वस्तुत: नीलाम्बुजश्याम मेरा राम हो सकता है। नहीं कदापि नहीं। इसी ऊहा पोह में कब रात्री हो गई पता ही नहीं चला। थके माँदे भूखे प्यासे तुलसी का अंग टूट रहा था। अचानक एक आहट सी हुई। वह ध्यान लगा करक सुनने लगा। अरे बाबा! तुलसीदास कौन है? एक कमनीय बालक हाथों में थाल लिए हुए बोले हाँ भाई! मैं ही हुँ तुलसीदास। बालक ने कहा, अरे: आप यहाँ क्या हैं। मैं बड़ी देर से आप को खोज रहा हूँ। अच्छा तो खोजने का कारण स्पष्ट कीजिए तुलसीदास ने कहा। बालक ने स्मित हास के साथ कहा लिजिए जगन्नाथ जा ने अपके लिए प्रसाद भेजा है। तुलसीदास अन्य मन क भाव से बोले कृपा कर के इसे वापस ले जाएं। मुझे इसका आवाश्यकता नहीं है। बालक सहसा बोल पड़ा, आश्चर्य की बात है, “ जगन्नाथ का भात- जगत पसारे हाथ” और वह भी स्वंय महाप्रभु ने आपके सिए प्रसाद भेजा है। परन्तु आप इसे अस्वीकार कर रहे हैं। अस्वीकृति का हेतु बताने का कष्ट करें। तुलसी बोले, अरे भाई! मैं बिना अपना इष्ट देवता को भोग लगाए बिना कोई वस्तु ग्रहण नहीं करता है। फिर यह जगन्नाथ का जूँठा प्रसाद जिसे मैं अपने इष्ट को समर्पित न कर सकूँ यह मेरे किस काम का! तज तो बालक ने मुस्कुराते हुए कहा, बाबा! आपके इष्ट ने ही तो यह प्रसाद भेजा है। तुलसी द्रढ़ता के साथ शुष्क भाव से बोले, यह हस्तपाद विहीन भोड़ा भाँड़ा दारू मूर्ति मेरा इष्ट कभी नहीं हो सकता। मेरा इष्ट तो कोटि काम कमनीय है। इस पर बालक ने विनम्र भाव से कहा कि अपने रामचरित मानस में तो आपने अपने इष्ट के इसी रूप का वर्णन करते हुए लिखा है-

“बिनु पग चलइ सुनइ बिन काना। कर बिन करम करइ विधि नाना।।

आनन रहित सकल रस भोगी। बिन बानी बकता बड़ जोगी।।

तन बिन परस नयन बिन देखा। ग्रहइ घ्राण बिनु बास अशेषा।।

असि सब भाणति अलौकिक करनी। महिमा अमित जाय नहिं बरनी।।

जेहि इमि गावहिं वेद बुध, जाहि धरहिं मुनि ध्यान।।

सोइ सशरथ सुत भगत हित कोसल पति भगवान।।“

अब तो तुलसीदास का भाव भंगिमा देखने लायक थी। नैनों से अश्रु विन्दु कपोलों तक ढुलक आए थे। मुक से शब्द नहीं निकल रहें थे। थाल उनके समीप रख कर बालक यह कहता हुआ अद्रश्य हो गया कि मैं ही राम हूँ। मैं हनुमान के बिना नहीं रह सकता। मेरे श्री मंदिर के रक्षक आंजनेय हैं। चारो द्वारों पर उनका पहरा है। विभिषण नित्य मेरे दर्शनार्थ आता है। कल प्रात: तुम भी आकर दर्शन कर लेना।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रद्धापूर्वक प्रेम से प्रसाद ग्रहण किया। सारी रात भजव करते व्यतीत हो गई। प्रात: श्री मंदिर में उन्हें जगन्नाथ बलभद्र सुभद्रा के स्थान पर श्रीराम लक्ष्मण जानकी के भव्य दर्शन प्राप्त हुए। भगवान ने भक्त की वाँछा पूर्ण की। तुलसीदास जी ने गदगद होकर उनकी प्रार्थना की।

जिस स्थान पर गोस्वामी जी ने रात्रि व्यतीत की थी वह स्थान “तुलसी चौरा”  नाम से विक्यात हुआ। वर्तमान समय में वहाँ पर तुलसीदास की प्रसिद्ध पीठ “बड़छता मठ” मठ के रूप में प्रतिष्ठित है। महाप्रभु के शयन श्रृंगार के समय तुलसी के पद गायन की प्रथा बन गई। महाप्रभु के शयन आरती के समय रत्न सिंहासन के नीचे धुलाई करके कलाहाट द्वारा पर टेरा (पर्दा) तान देते हैं। इस पर्दे की यह विशेषता है कि महाप्रभु की तीनों मूर्तियों के आधार एंव ओष्ठ बाहर से दिखाई नहीं देते। तदन्तर पाकशाला से भोग लाककर रखा जाता है। जिस समय महाप्रभु  का भोग लगता है इस समय बाहर बैठे बड़छाता मठ (तुलसी पीठ) के समत जन मांझ मंजीरे से परवावज पर पारम्पारिक तान छेड़ते हैं।“रजनी बहुत गई मेरे प्यारे” विषिष्ट भजन जिसका भाव है कि हे महाप्रभु रात्रि बहुत व्यतीत हो गई है। जल्दी अन्य कार्य समाप्त कर के भओजन करने के लिए हम आपसे अनुरोध करते हैं। यह एक वातसल्य ममता मय कीर्तन है जिसका गान अन्य किसी स्थान पर निषिद्ध है केवल इसी समय श्री जगन्नाथ मंदिर में महाप्रभु के सम्मुख सैकडों वर्षों से यही कीर्तन गाया जाता है जिसे गाते हुए नित्य रात्रि में महाप्रभु नैवेध ग्रहण करते चले आ रहे हैं। तदुपरान्त अन्य नियम पारित होते हैं। महाप्रभु के शैय्या लगा दी जाती है। पान समर्पित किए जाते हैं। रात्रि के लिए भी रखे जाते हैं। फिर महाप्रभु जयदेव कृत गोविन्द के पदों की छपी हुई चादर ओढ़कर विश्राम करते हैं। बाहर वहीं सन्त जन पारम्पारिक पद गायन करते हैं जिसे सुनते हुए भगवान शयन करते हैं। अन्ततोगतवासन्त मण्डली यह पद गाते हुए भजन समाप्त करते हैं “चलो सखि सोए अवध किशोर”। तदुपरान्त पण्डा जी के साथ कलाहट द्वार बन्द  कर के सिंहद्वार की ओर प्रस्थान करते है और सिंहद्वार बाद कराके अपने मठ के ओर लौट जाते हैं। यह परंपरा अक्षुन्य रूप से सैकड़ों वर्षों से ऐसे ही नित्य होती चली आ रही है। महाप्रभु जगन्नाथ जी के दैनन्दिनि नीतियों में विशिष्ट सेथान है। इस नीति के समय भक्तों के मन में प्राण उल्लसित होने के साथ-साथ अलौकिक अनुभूति भी प्राप्त करते हैं। भक्त का मन भगवत् सत्ता ता प्रत्यक्ष आमास प्राप्त कर लेता है। धन्य हैं सन्त तुलसी और धन्य है उनकी भक्ति।

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वाह ज़िन्दगी

सिद्धदाता आश्रम में डेल्टा प्लस वायरस से मुक्ति के लिए यज्ञ

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फोटो – श्री सिद्धदाता आश्रम में नए डेल्टा प्लस वायरस के खात्मे के लिए यज्ञ करते जगदगुरु स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य जी महाराज।

जगदगुरु स्वामी श्री पुरुषोत्तमाचार्य जी महाराज ने किया जनकल्याण के लिए यज्ञ

फरीदाबाद। सूरजकुंड रोड स्थित श्री लक्ष्मीनाराण दिव्यधाम (सिद्धदाता आश्रम) में अधिष्ठाता श्रीमद जगदगुरु रामानुजाचार्य स्वामी श्री पुरुषोत्तमाचार्य जी महाराज ने डेल्टा प्लस वायरस से मुक्ति के लिए यज्ञ किया। उन्होंने कहा कि इस यज्ञ के माध्यम से उन्होंने परमपिता परमात्मा से सभी जीवों को रोगमुक्ति की भी प्रार्थना की।

डेल्टा प्लस वायरस का मामला फरीदाबाद में भी उजागर होने को स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य जी महाराज ने कड़ाई से लिया है। उन्होंने आश्रम में इस वायरस के खात्मे के लिए विशेष यज्ञ किया। करीब 24 घंटे चले इस यज्ञ में दर्जनों पुरोहितों के साथ उन्होंने समिधा डाली। स्वामी जी ने बताया कि वैदिक सनातन धर्म में प्राकृतिक आपदाओं से मुक्ति के लिए अनेक उपाय मौजूद हैं। जिनका प्रयोग कर हम सर्वसमाज को रोगमुक्त और संपन्न बनाए रख सकते हैं।

गौरतलब है कि इस कोरोना काल में श्री सिद्धदाता आश्रम की ओर से समाज का भरसक सहयोग किया गया। इसमें प्रशासन के साथ मिलकर और आश्रम में भोजन का वितरण करना, वैक्सीनेशन कैंप का आयोजन करना व अन्य जरूरी सामान को बांटना आदि शामिल हैं। इसी कड़ी में आज का यह यज्ञ भी महत्वपूर्ण किरदार निभाएगा।

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वाह ज़िन्दगी

आपातकाल में मकरसंक्रांति कैसे मनाएं ?

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‘कोरोना की पृष्ठभूमि पर गत कुछ महीनों से त्योहार-उत्सव मनाने अथवा व्रतों का पालन करने हेतु कुछ प्रतिबंध थे । यद्यपि कोरोना की परिस्थिति अभी तक पूर्णतः समाप्त नहीं हुई है, तथापि वह धीरे-धीरे पूर्ववत हो रही है । ऐसे समय त्योहार मनाते समय आगामी सूत्र ध्यान में रखें ।

  1. त्योहार मनाने के सर्व आचार, (उदा. हलदी-कुमकुम समारोह, तिलगुड देना आदि) अपने स्थान की स्थानीय परिस्थिति देखकर शासन-प्रशासन द्वारा कोरोना से संबंधित नियमों का पालन कर मनाएं ।
  2. हलदी-कुमकुम का कार्यक्रम आयोजित करते समय एक ही समय पर सर्व महिलाआें को आमंत्रित न करें, अपितु ४-४ के गुट में 15-20 मिनट के अंतर से आमंत्रित करें ।3. तिलगुड का लेन-देन सीधे न करते हुए छोटे लिफाफे में डालकर उसका लेन-देन करें ।
  3. आपस में मिलते अथवा बोलते समय मास्क का उपयोग करें ।5. किसी भी त्योहार को मनाने का उद्देश्य स्वयं में सत्त्वगुण की वृद्धि करना होता है । इसलिए आपातकालीन परिस्थिति के कारण प्रथा के अनुसार त्योहार-उत्सव मनाने में मर्यादाएं हैं, तथापि इस काल में अधिकाधिक समय ईश्‍वर का स्मरण, नामजप, उपासना आदि करने तथा सत्त्वगुण बढाने का प्रयास करने पर ही वास्तविक रूप से त्योहार मनाना होगा ।

मकरसंक्रांति से संबंधित आध्यात्मिक विवेचन

त्योहार, उत्सव और व्रतों को अध्यात्मशास्त्रीय आधार होता है । इसलिए उन्हें मनाते समय उनमें से चैतन्य की निर्मिति होती है तथा उसके द्वारा साधारण मनुष्य को भी ईश्‍वर की ओर जाने में सहायता मिलती है । ऐसे महत्त्वपूर्ण त्योहार मनाने के पीछे का अध्यात्मशास्त्र जानकर उन्हें मनाने से उसकी फलोत्पत्ति अधिक होती है । इसलिए यहां संक्रांत और उसे मनाने के विविध कृत्य और उनका अध्यात्मशास्त्र यहां दे रहे हैं ।

  1. उत्तरायण और दक्षिणायन :

इस दिन सूर्य का मकर राशि में संक्रमण होता है । सूर्यभ्रमण के कारण होनेवाले अंतर की पूर्ति करने हेतु प्रत्येक अस्सी वर्ष में संक्रांति का दिन एक दिन आगे बढ जाता है । इस दिन सूर्य का उत्तरायण आरंभ होता है । कर्क संक्रांति से मकर संक्रांति तक के काल को ‘दक्षिणायन’ कहते हैं । जिस व्यक्ति की उत्तरायण में मृत्यु होती है, उसकी अपेक्षा दक्षिणायन में मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति के लिए, दक्षिण (यम) लोक में जाने की संभावना अधिक होती है ।

  1. संक्रांति का महत्त्व : इस काल में रज-सत्त्वात्मक तरंगों की मात्रा अधिक होने के कारण यह साधना करनेवालों के लिए पोषक होता है ।
  2. तिल का उपयोग : संक्रांति पर तिल का अनेक ढंग से उपयोग करते हैं, उदाहरणार्थ तिलयुक्त जल से स्नान कर तिल के लड्डू खाना एवं दूसरों को देना, ब्राह्मणों को तिलदान, शिवमंदिर में तिल के तेल से दीप जलाना, पितृश्राद्ध करना (इसमें तिलांजलि देते हैं) श्राद्ध में तिलका उपयोग करने से असुर इत्यादि श्राद्ध में विघ्न नहीं डालते । आयुर्वेदानुसार सर्दी के दिनों में आनेवाली संक्रांति पर तिल खाना लाभदायक होता है । अध्यात्मानुसार तिल में किसी भी अन्य तेल की अपेक्षा सत्त्वतरंगे ग्रहण करने की क्षमता अधिक होती है तथा सूर्य के इस संक्रमण काल में साधना अच्छी होने के लिए तिल पोषक सिद्ध होते हैं ।

3 अ. तिलगुड का महत्त्व : तिल में सत्त्वतरंगें ग्रहण करने की क्षमता अधिक होती है । इसलिए तिलगुड का सेवन करने से अंतःशुद्धि होती है और साधना अच्छी होने हेतु सहायक होते हैं । तिलगुड के दानों में घर्षण होने से सात्त्विकता का आदान-प्रदान होता है ।

4 अ. हलदी-कुमकुम लगाना : हलदी-कुमकुम लगाने से सुहागिन स्त्रियों में स्थित श्री दुर्गादेवी का सुप्त तत्त्व जागृत होकर वह हलदी-कुमकुम लगानेवाली सुहागिन का कल्याण करती है ।

4 आ. इत्र लगाना : इत्र से प्रक्षेपित होनेवाले गंध कणों के कारण देवता का तत्त्व प्रसन्न होकर उस सुहागिन स्त्री के लिए न्यून अवधि में कार्य करता है । (उस सुहागिन का कल्याण करता है ।)

4 इ. गुलाबजल छिडकना : गुलाबजल से प्रक्षेपित होनेवाली सुगंधित तरंगों के कारण देवता की तरंगे कार्यरत होकर वातावरण की शुद्धि होती है और उपचार करनेवाली सुहागिन स्त्री को कार्यरत देवता के सगुण तत्त्व का अधिक लाभ मिलता है ।

4 ई. गोद भरना : गोद भरना अर्थात ब्रह्मांड में कार्यरत श्री दुर्गादेवी की इच्छाशक्ति को आवाहन करना । गोद भरने की प्रक्रिया से ब्रह्मांड में स्थित श्री दुर्गादेवीची इच्छाशक्ति कार्यरत होने से गोद भरनेवाले जीव की अपेक्षित इच्छा पूर्ण होती है ।  

4 उ. उपायन देना : उपायन देते समय सदैव आंचल के छोर से उपायन को आधार दिया जाता है । तत्पश्‍चात वह दिया जाता है । ‘उपायन देना’ अर्थात तन, मन एवं धन से दूसरे जीव में विद्यमान देवत्व की शरण में जाना । आंचल के छोर का आधार देने का अर्थ है, शरीर पर धारण किए हुए वस्त्र की आसक्ति का त्याग कर देहबुद्धि का त्याग करना सिखाना । संक्रांति-काल साधना के लिए पोषक होता है । अतएव इस काल में दिए जानेवाले उपायन सेे देवता की कृपा होती है और जीव को इच्छित फलप्राप्ति होती है ।

4 उ 1. उपायन में क्या दें ? : आजकल साबुन, प्लास्टिक की वस्तुएं जैसी अधार्मिक सामग्री उपायन देने की अनुचित प्रथा है ।

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वाह ज़िन्दगी

तुलाराशि के लोगों के लिए कैसा होगा बुध

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तुला राशि में बुध का गोचर

बुध को व्यापार, बुद्धि, वाणी आदि का कारक माना गया है| विशेष बात ये है कि तुला राशि में बुध वक्री हो रहा है| बुध का वक्री होना ज्योतिष शास्त्र में अति महत्वपूर्ण माना जा रहा है|वैसे तो बुध का यह गोचर सभी राशियों को प्रभावित करेगा लेकिन तुला राशि के जातकों पर इसका विशेष प्रभाव रहेगा|क्योंकि तुला राशि में बुध का गोचर हो रहा है|तुला राशि में बुध बारहवें और नवें भाव का स्वामी माना गया है| बुध का गोचर तुला राशि के प्रथम भाव में हो रहा है|जन्म कुंडली के पहले भाव से व्यक्तित्व, शरीर, आदि का विचार किया जाता|

तुला राशिफल
तुला राशि में बुध के आने से कई मामलों में अच्छे परिणाम देखने को मिलेंगे|बुध का यह गोचर तुला राशि के जातकों को जॉब और व्यापार में अच्छे परिणाम देगा|लेकिन छोटी छोटी चीजों को पाने के लिए भी अधिक परिश्रम करना पड़ेगा|वहीं उन कार्यों को करने में अधिक रूचि और समय खर्च करेंगे जिन्हें आप पहले ही कर चुके हैं|इस दौरान मानसिक तनाव भी हो सकता है|प्यार के मामले में अधिक भावुक रहना आपके लिए हितकर साबित नहीं होगा|विद्यार्थियों के लिए यह समय अच्छा रहेगा|इस दौरान यात्राएं भी कर सकते हैं|परिवार के साथ अच्छा समय गुजरेगा| भगवान गणेश की पूजा करने से लाभ प्राप्त होगा|

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