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गुजरात में पलायन की त्रासद घटनाएं क्यों?

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Lalit Garg 

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हम कैसा समाज बना रहे हैं? जहां पहले हिन्दू और मुसलमान के बीच भेदरेखा खींची गई फिर सवर्ण और हरिजन के बीच, फिर अमीर और गरीब के बीच और ग्रामीण और शहरी के बीच। अब एक प्रांत और दूसरे प्रांत के बीच खींचने का प्रयास किया जा रहा है। यह सब करके कौन क्या खोजना चाहता है- मालूम नहीं? पर यह निश्चित एवं दुखद है कि राष्ट्रीयता को नहीं खोजा जा रहा है, राष्ट्रीयता को बांटने की कोशिश की जा रही है। इनदिनों गुजरात में ऐसा ही कुछ हो रहा है, जहां रहने वाले बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों को धमकी देकर भगाए जाने की त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण घटनाएं घटी है और इन मामलों पर सियासत तेज हो रही है।

गुजरात में बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों के प्रति जैसी भावनाएं दिख रही हैं, वह गंभीर चिंता का विषय है और राष्ट्रीयता को आहत करने वाला है। अब शायद उसका असर दूसरे व्यवहारों पर भी पड़ने लगा है। वडोदरा में गत सोमवार की रात बिहार के सात लोगों पर कुछ स्थानीय लोगों ने सिर्फ इसलिए हमला कर दिया कि उन्होंने लुंगी पहन रखी थी। हमले के पीछे दलील दी जा रही है कि लुंगी पहनने वाले लोग कथित रूप से अश्लील तरीके से बैठे हुए थे। मगर यह समझना मुश्किल है कि एक साथ इतने लोग जानबूझ कर लुंगी पहन कर अश्लील तरीके से क्यों बैठेंगे भला? सवाल यह भी है कि स्थानीय लोगा की शिकायत को सही भी मान लिया जाए कि लुंगी पहनकर वहां अश्लील तरीके से न बैठने के लिए लगातार कहे जाने के बावजूद वे लोग नहीं मान रहे थे, तो उनके खिलाफ पुलिस में शिकायत क्यों नहीं की गई?

प्रश्न है कि गुजरात में ऐसा क्या हुआ कि एकाएक प्रवासियों को अपनी रोजी-रोटी छोड़कर पलायन करना पड़ रहा है। मुख्य वजह भले ही हाल में बलात्कार की एक घटना के बाद मूल रूप से बिहार और उत्तर प्रदेश के रहने वाले लोगों पर हमले से पैदा हुई हवा बनी है, लेकिन इसका दूसरा पक्ष राजनीति स्वार्थों की ओर भी इशारा कर रहा है। यह किसी से छिपा नहीं है कि पिछले कुछ समय से बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों को हिंसा का निशाना बनाया जा रहा है। इसकी वजह से बहुत सारे प्रवासियों ने या तो गुजरात छोड़ दिया है या फिर वहां बचे हुए लोग एक खास तरह के डर के बीच रह रहे हैं। अपनी ओर से उकसावे की कोई छोटी घटना भी इन लोगों पर स्थानीय निवासियों के हमले की थम रही आग को फिर से हवा दे सकती है और दे रही है। लुंगी पहनकर अश्लीलता फैलाना एक बहाने के तौर पर ऐसी ही हवा का काम कर गयी है। जहां तक लुंगी पहनने से शिकायत का सवाल है, तो क्या होगा वहां इस पहनावे में रहने वाले लोग केवल बिहार या उत्तर प्रदेश के होंगे? तमिलनाडु और केरल के लोगों सहित देश भर में एक बड़ी आबादी ऐसी है, जो या तो क्षेत्रीय पहनावे के तौर पर या फिर घरों में रोजमर्रा के एक सुविधाजनक वस्त्र के रूप में लुंगी का इस्तेमाल करती है।
गुजरात में प्रवासियों पर हो रही हिंसा एवं उन्हें पलायन के लिये विवश करने की घटनाओं को लेकर राजनीति खूब हो रही है। भाजपा इसके लिए कांग्रेस को जिम्मेदार मान रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेता गिरिराज सिंह का मानना है कि यह कांग्रेस की सोची-समझी साजिश है। कांग्रेस के लोग पूरे देश को खंडित करने में जुटे हैं। सब कुछ अल्पेश की सेना कर रही है। बिहार में सत्तारूढ़ जनता दल (यूनाइटेड) ने सोमवार को कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी को खुला पत्र लिखकर विधायक अल्पेश ठाकोर को इस पूरे घटनाक्रम के लिए जिम्मेदार बताया। जेडीयू ने पूछा कि कांग्रेसियों को बिहार के लोगों से इतनी नफरत क्यों है? आज गुजरात में जो विकास दिख रहा है, वह बिहारी ही नहीं पूरे देश के लोगों के खून-पसीने का नतीजा है। गुजरात ही क्यों देश का हर क्षेत्र एक-दूसरे पर आश्रित है, सब आपस में मिलकर ही राष्ट्रीयता को मजबूती देते हैं। फिर यह प्रांतीयता की भावना क्यों उकसायी जा रही है, क्यों एक ही देश के नागरिकों को आपस में लड़ाया जा रहा है, भड़काया जा रहा है? यदि समाज पूरी तरह जड़ नहीं हो गया है तो उसमें सुधार की प्रक्रिया चलती रहनी चाहिए। यह सामाजिक जीवन की प्राण वायु है। यही इसका सबसे हठीला और उत्कृष्ट दौर है। क्योंकि राष्ट्रवादी की लड़ाई सदैव अवसरवादी से है, तो फिर वहीं पर समझौता क्यों? वहीं पर घुटना टेक क्यों? अवसरवाद कहीं इतना ताकतवर नहीं बन जाए कि राष्ट्रवाद अप्रासंगिक हो जाए। राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादी की मुखरता प्रभावशाली बनी रहे। सुधार में सदैव हम अपेक्षाकृत बेहतर मुकाम पर होना चाहते हैं, न कि पानी में गिर पड़ने पर हम नहाने का अभिनय करने लगें। वह तो फिर अवसरवादी राजनीति ही होगी।
कुछ प्रवासी लोगों का कहना है कि उनके मकान मालिकों ने उनसे घर छोड़ने को कहा। जबकि पुलिस ने भी कहा कि प्रवासियों को लक्षित करने के लिए गांधीनगर, अहमदाबाद, साबरकांठा, पाटन और मेहसाणा जिलों में कम से कम 180 लोगों को गिरफ्तार किया गया। कानून-व्यवस्था को ताक पर रखकर क्षेत्र या समुदाय आधारित किसी खास पहचान वाले लोगों पर हमले की प्रवृत्ति सख्ती से रोकी नहीं गई, तो इसके नतीजे जटिल हालात पैदा कर सकते हैं। किसी भी बहाने से अगर एक खास समुदाय या क्षेत्र के लोगों के खिलाफ हमले शुरू होते हैं या उन्हें निशाना बनाया जाने लगता है तो उसमें इसके लिए सिर्फ पहचान चाहे वह लूंगी ही क्यों न हो, को आधार बना लिया जाता है। फिर हमला करने वाले लोग एक भीड़ में तब्दील हो जाते हैं, जिनके लिए तर्क या संवेदना कोई महत्व नहीं होता। ऐसे लोग जीवन के हर मोड़ पर मिलेंगे बस सिर्फ चेहरे बदलते रहते हैं। ऐसे लोगों के पास खोने को कुछ नहीं होता। इसलिए नुकसान में सदैव वे होते हैं, जिनके पास खोने को बहुत कुछ होता है।
वक्त इतना तेजी से बदल जाएगा, यह उन्होंने भी नहीं सोचा था जो वक्त  बदलने चले थे। धूप को भला कभी कोई मुट्ठी में बन्द रख पाया है? जो सीढ़ी व्यक्ति को ऊपर चढ़ाती है, वह ही नीचे उतार देती है। सीढ़ी के ऊपर वाले पायदान पर सदैव कोई खड़ा नहीं रह सकता। जीर्ण वस्त्रों पर से विजय के सुनहरी तगमे उतार लिए जाते हैं, एक दिन सबको पराजय का साक्षात्कार करना पड़ता है। इतिहास में सब कुछ सुन्दर और श्रेष्ठ नहीं होता। उसमें बहुत कुछ असुन्दर और हेय भी होता है। सभी जातियों और वर्गों एवं पार्टियों के इतिहास में भी सुन्दर और असुन्दर, महान् और हेय, गर्व करने योग्य और लज्जा करने योग्य भी  होता है। अतीत को राग-द्वेष की भावना से मुक्त करने के लिए समय की एक सीमा रेखा खींचना जरूरी होता है। क्योंकि इतिहास को अन्ततः मोह, राजनीतिक स्वार्थ, वैर से परे का विषय बनाना चाहिए। उदार समाज इतिहास की इस अनासक्ति को जल्दी प्राप्त करता है और पूर्वाग्रहित, धर्मान्ध समाज देरी से। लेकिन इस अनासक्ति को प्राप्त किये बगैर कोई समाज, कोई देश आगे नहीं बढ़ सकता।
सोच के कितने ही हाशिये छोड़ने होंगे। कितनी लक्ष्मण रेखाएं बनानी होंगी। सुधार एक अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है। कानून सुधार की चार दीवारी बनाता है, धरातल नहीं। मन परिवर्तन ही इसकी शुद्ध प्रक्रिया है। अगर समाज की गलती के लिए कोई अभियुक्त है तो समकालीन सभी नेता और कार्यकत्र्ता सहअभियुक्त हैं। जैसे शांति, प्रेम, राष्ट्रीयता की भावना खुद नहीं चलते, चलाना पड़ता है, ठीक उसी तरह राजनीतिक स्वार्थ एवं वोट की राजनीति के लिये समुदाय, क्षेत्रवाद एवं प्रान्तवाद की संकीर्णताएं दूसरों के पैरों से चलती है। जिस दिन उनसे पैर ले लिये जायेंगे, वे पंगु हो जायेंगे।
महान् अतीत महान् भविष्य की गारण्टी नहीं होता। राजनीतिक बयानों और भाषणों में सुधार की आशा करना गर्म तवे पर हाथ फेरकर ठण्डा करने का बचकाना प्रयास होगा। मनुष्य के सुधार के प्रति संकल्प को सामूहिक तड़प बनाना होगा। मनुष्य के चरित्र पर उसकी सौगन्धों से ज्यादा विश्वास करना होगा। कुछ विषय अन्य प्रबुद्ध व्यक्तियों एवं पंचों की तरफ से परस्पर संवादों के लिए प्रसारित किये जाते हैं। उनमें से एक है कि ”राजनीतिक दलों और सरकारों को बदले की भावना नहीं रखनी चाहिए।“ इस विषय के कई प्रबल पक्षधर हैं तो कई ”न्याय हो“ का नारा देकर बदले की भावना को साफ नीयत का जामा पहना रहे हैं।
बी-380, प्रथम तल, निर्माण विहार, दिल्ली-110092
9811051133
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नगर निगम ने फरीदाबाद शहर को बना दिया कूड़े का ढेर – जसवंत पवार

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वैसे तो फरीदाबाद शहर को अब स्मार्ट सीटी का दर्जा प्राप्त हो चूका है, परन्तु शहर के सड़कों पर गंदगी के ढेर  फरीदाबाद प्रशासन और नगर को आइना दिखा रहे हैं

शहर के अलग अलग मुख्य चौराहों और सड़कों पर पढ़े कूड़े के ढेर को लेकर समाज सेवी जसवंत पवार ने फरीदाबाद प्रशासन और नगर निगम कमिश्नर से पूछा है कि एक तरफ भारत के प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी कहते हैं कि स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत मुहिम को पूरे देश में चला रहे हैं वही नगर निगम इस पर पानी फेरता दिख रहे हैं फरीदाबाद में आज सड़कों पर देखे तो गंदगी के ढेर लगे हुए हैं पूरे शहर को इन्होंने गंदगी का ढेर बना दिया है। जिसके चलते फरीदाबाद शहर अभी तक एक बार भी स्वछता सर्वेक्षण में अपनी कोई अहम् भूमिका अदा नहीं कर पा रहा,  अगर ऐसे ही चलता रहा तो हमारा फरीदाबाद शहर स्वच्छता सर्वे में फिर से फिसड्डी आएगा। साल 2021 में स्वछता सर्वेक्षण 1 मार्च से 28 मार्च तक किया जाना है जिसको लेकर लगता नहीं की जिला प्रसाशन व फरीदाबाद के नेता और मंत्री फरीदाबाद शहर की स्वछता को लेकर बिल्कुल भी चिंतित दिखाई नहीं पढ़ते है।

जसवन्त पंवार ने फरीदाबाद वासियों से अनुरोध और निवेदन किया है अगर हमें अपना शहर स्वच्छ और सुंदर बनाना है तो हम सबको मिलकर प्रयास करने होंगे जहां पर भी गंदगी के ढेर हैं आप वीडियो बनाएं सेल्फी ले फोटो खींचे और नेताओं और प्रशासन तक उसे पहुंचाएं, हमें जागरूक होना होगा तभी जाकर यह फरीदाबाद शहर हमारा स्वच्छ बन पाएगा। आप हमें इस नंबर पर वीडियो और फोटो भेज सकते हैं

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क्यों हर दो महीने में आता है बिजली का बिल?

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हम सभी अपने कुछ रोजमर्रा में प्रयोग होने वाली चीजों के बिलों का भुगतान हर महीने करते हैं। जैसे बैकों की किश्तंे, घर का किराया इत्यादि। लेकिन क्या आपने कभी इस बात पर गौर फरमाया है कि जब हर चीज का भुगतान हम महीने दर महीने करते हैं। तो बिजली के बिल का ही भुगतान हर दो महीने में क्यों?

इस पर बिजली निगम का कहना है कि बिलिंग प्रक्रिया से जुड़ी एक लागत होती है। जिसमें मीटर रीड़िंग की लागत, कम्प्यूटरीकृत प्रणाली में रीडिंग फीड़ करने की लागत, बिल जेनरेशन की लागत, प्रिंटिग और बिलों को वितरित करने की लागत आदि चीजें शामिल होती हैं। इन लागतों को कम करने के लिए बिलिंग की जाती हैं। इसलिए बिजली बिल 2 महीने में आता है।
फिलहाल बिजली निगम 0-50 यूनिट तक 1.45 रूपये प्रति यूनिट, 51-100 यूनिट तक 2.60 रूपये प्रति यूनिट चार्ज करता है।
आप यह अनुमान लगाइए कि यदि किसी छोटे परिवार की यूनिट 50 से कम आती है। तो उसका चार्ज 1.45 रूपये प्रति यूनिट होगा लेकिन जब बिल दो महीने में जारी होगा। तो उसका 100 यूनिट से उपर बिल आएगा। मतलब साफ है कि उसे प्रति यूनिट चार्ज 2.60 रूपये देना होगा । ऐसे में उस गरीब को सरकार की छूट का लाभ नहीं मिला लेकिन सरकार ने पूरी वाह-वाही लूट ली।
आप यह बताइए जिस घर में सदस्य कम है। तो उस घर की बिजली खपत भी कम होगी और बिल भी कम ही आएगा। मतलब साफ है उपयोग कम तो यूनिट भी कम। यदि बिजली बिल एक महीने में आता है तभी ही तो जनता को इसका लाभ मिलेगा।
लेकिन चूंकि बिल दो महीने में आता है इसलिए गरीब को या छोटे परिवार को महंगी बिजली प्रयोग करनी पड़ रही है।
एक तरफ बिजली निगम अपना फायदा देख रहा है। तो दूसरी तरफ सरकार सस्ती बिजली की घोषणा करके, एक राजनीतिक मुद्द्ा बना कर, जनता की वाह-वाही लूट रही है। लेकिन जनता को लाभ मिल ही नहीं रहा क्योंकि सरकार तो दो महीने में लोगों को बिल दे रही हैं। इसलिए जब महीने में एक बार बिल आएगा तभी आम जनता को लाभ प्राप्त होगा। सरकार कब तक जनता को अपने घोषणाओं के जाल में फंसाती रहेगी? कब जनता को अपनी दी हुई पूंजी का सही लाभ प्राप्त होगा?

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क्यों राहुल गांधी बिना किसी बात के भी फंस जाते हैं?

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आई ए एस अधिकारी टीना डाबी को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी एक बार फिर सोशल मीडिया में ट्रोल हो गए हैं। खबर बस इतनी है कि दलित समाज से आने वाली टीना मुस्लिम समाज से आने वाले अपने पति अतहर से तलाक ले रहीं हैं।

दिल्ली शहर की रहने वाली 24 वर्षीय टीना डाबी जो 2015 की सिविल परीक्षा में टाॅप करके आई ए एस अधिकारी बनी थी। उन्होंने कश्मीर के मटट्न नामक शहर में रहने वाले अतहर खान से शादी कर ली जो उसी परीक्षा में दूसरे स्थान पर था।
टीना पहली दलित महिला थी जिसने यूपीएससी की परीक्षा में टाॅप किया था।
टीना और अतहर की शादीशुदा जोड़ी को उनके विवाह के दौरान जय भीम और जय मीम की एकता, मुस्लमान और दलितों के बीच में सबधों की मिसाल बताया गया था। उस समय राहुल गांधी ने स्वंय अपने ट्वीटर अकांउट से ट्वीट करते हुए कहा था कि ये जोड़ी मिसाल कायम करेगी। यह हिंदू, मुस्लमानों की एकता का प्रतीक है।
लेकिन आपसी मतभेदों के कारण जयपुर के पारिवारिक न्यायालय में इस जोड़ी ने तलाक की अर्जी दाखिल की है। अब ये जोड़ी तलाक ले रही हैं और लोग राहुल गांधी को लानत दे रहे हैं ‘दिख गई सहजता। दिखा लिया भाईचारा।।‘
आज कांग्रेस की जो हालत है या राहुल गांधी की जो हालत है वो इस वजह से है क्योंकि राहुल ने हर मुद्दे में केवल जाति व धर्म का एंगल खोजा और उसका तुष्टीकरण किया। उन्होंने सर्व समाज से बातें करने में हमेशा परहेज किया। केवल धर्म और जातियों में खास दृष्टिकोण खोजते रहे।
अब तक देखने में आया है कि घटना किसी दलित के साथ हुई है तो वह एक्शन लंेगे और यदि वह दलित कांग्रेस शासित राज्य में है तो एक्शन नहीं लेंगे। उसी प्रकार कोई घटना मुस्लिम के साथ है तो वह आवाज उठाएंगे और यदि वह मुस्लिम अपने शासित राज्य में है तो वो आवाज दबा दंेगे।
इसी कारण से कांग्रेस की हालत यह हो गई है कि लोग उन्हें धर्म और जाति का मुद्दा उठते ही लोग लानत देने लगते हैं।

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