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हम मार देते हैं (उनकी) जिज्ञासा

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कुलदीप सिंह
हम आज एक विशेष क्षेत्र में अपनी पहचान बना रहे हैं – मेरा संकेत आजकल के अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने वाले स्कूलों से है। अधिकांश परिवारों के लोग भारत में घर में अपनी घरेलू भाषा में ही बात करते हैं परन्तु अपने छोटे-छोटे बच्चों को अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों में दाखिला दिलाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते। क्यों?
ये (तथाकथित) अंग्रेजी स्कूल तो मोह पाश के मायाजाल की तरह हैं जो देखने में बहुत सुन्दर और आकर्षक लगते हैं परन्तु छोटे बच्चों की जिज्ञासा और कौतूहल को अनजाने में मार देते हैं। खूबसूरत यूनिपफार्म में सजा-धजा बच्चा स्कूल की अपनी उस कक्षा के कमरे में घुसरता है जहां न केवल उसके घूमने पिफरने पर बंदिशे हैं। उस कमरे से बिना पूछे बाहर नहीं जा सकता बल्कि एक ऐसे भाषा माध्यम से उसका सामना होता है जिसे वह नहीं क बराबर जानता है। कितना कष्टकारक होगा यह दृश्य कल्पना कीजिए आप कुछ ऐसे लोगों से घिर गए हो- जो केवल पश्तो (अनजानी) भाषा में ही बोल रहे हो और आप….। पिफर भी वह बच्चा तेा बहुत उदार है जो ऐसी पिफल्म के दृश्यों को देखने समझने का साहस करता है जिसे वह समझता ही नहीं। शायद वह इसे ऐसे रोमांचक कार्य के रूप में लेता है। जिसमें उसे लगता है कि एक दिवस ऐसा भी होगा। जब वह इस भाषा अवरोध को पार कर लेगा चले चलो…। जो कुछ भी हो, थोड़े समय में ही उसके दिमाग में अर्थहीन अंकों और तुकबंदियों की भीड़ लग जाती है लेकिन अपनी क्लास के सहपाठियों की दोस्ती के सहारे शायद वह अपनी अरूचिकर आनंदविहीन यात्रा जारी रखता है। जहां उसे खिलौने खेलने और उछलकूद के अवसरों की आशा होती है। चतुर्दिक हरियाली से लेकर अपनी क्लास तक के भिन्न-भिन्न वातावरण से वह भिन्न-भिन्न बातें सीखता है। उसका इम्तिहान लिया जाता है। उसे प्रश्न पत्रा हल करने को दिया जाता है, भले ही वह उसे पढ़ नहीं सकता तो क्या हुआ। उसका शिक्षक उसे बताता है कि उसे क्या करना है। उसे इस तरह का होमवर्क मिलता है जिसे वह खुद नहीं कर सता और आशा यह की जाती है कि वह करके लाए और उस पर सर्दियों में भी सुबह जल्दी-जल्दी उठना और स्कूल बस पकड़ने की आपाधापी…। जिन्दगी बहुत कठिन….पर दूसरा कोई रास्ता भी तो नहीं है। अगर बच्चों को बाहर घूमने दौड़ने की आजाद दे दी जाए तो क्लास में किसी बच्चे को बैठा देख मुझे आश्चर्य ही होगा (यदि वह स्वस्थ है तो) क्या हम ऐसे स्वस्थ शिक्षण तंत्रा का विकास नहीं कर सकते। जहां अधिक आजादी हो और जहां बच्चे को इतस तरह पढ़ाया जा सके। जिससे उसकी सीखने की जिज्ञासा और कौतूहल को जानने का भाव अर्थपूर्ण ढंग से तजी से बढ़ सके।
जी हां यह संभव है यदि प्रगतिवादी स्कूल, बच्चों की उम्र को ध्यान में रखते हुए स्वस्थ, यथार्थपरक ओर गुणवत्तायुक्त मूल्य परक शिक्षा प्रदान करने के लिए ऐसी संभावनाओं पर ईमानदारी से विचार करें जो उचित समाधान और हल प्रदान कर से। परिणाम बहुत ही उत्तम होगा। यूरोपियन स्कूल इसके उदाहरण है। भारत में भी कुछ ऐसे स्कूल है परन्ु उनकी संख्या बहुत ही कम है। भारत के अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों ने अभिभावकों को भी इस हद तक दिगभ्रमित कर दिया है कि वे भी इस अंधी दौड़ में शामिल होने में बहुत गर्व महसूस करते हैं और अपने नन्हें अबोध बच्चों को भविष्य का आईस्टाइन बनते देखने का दिवास्वप्न पाले हुए हैं – जो कभी भी नहीं होने वाला।
अध्यक्ष – अमृत गुरुदेव एजुकेशन सोसायटी फरीदाबाद

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मंत्री कृष्णपाल गुर्जर ने क्यों कहा, यह कांग्रेस की नहीं मोदी की सरकार है

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पत्रकार को पालतू कहने पर मीडियाकर्मियों में तू-तू मैं-मैं

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फरीदाबाद। एनआईटी विधानसभा से कांग्रेस विधायक नीरज शर्मा ने नगर निगम द्वारा उनकी मां के घर पर तोडफ़ोड़ की काईवाई के विरोध में प्रेस कांफ्रेंस आयोजित की थी।
लेकिन यहां अकसर नीरज शर्मा के साथ रहने वाले एक पत्रकार को अन्य मीडियाकर्मियों द्वारा इस मौके पर उपस्थित न रहने पर सवाल दागा। जिस पर विधायक ने इस बारे में जवाब देने में असमर्थता जताई। जिस पर एक अन्य मीडियाकर्मी ने उस पत्रकार को पालतू तक कह डाला। वहीं एक अन्य पत्रकार ने उसे चोर और डाकू कहकर संबोधित कर दिया और उसके चार लाख रुपये दिलवाने के लिए भी विधायक से कहा।
इस पर उस पत्रकार के प्रतिनिधि ने विरोध किया और कहा कि वह आज शहर में नहीं हैं और उनके प्रतिनिधि के तौर पर वह कवरेज कर रहे हैं। इस पर आरोप लगा रहे पत्रकार भडक़ गए और आपस में तू-तू मैं-मैं शुरू हो गई।
इस पत्रकार ने तो यहां तक कह दिया कि उस पालतू के सामने मेरा नाम ले देना। इतना ही काफी है। वह मेरा सामना नहीं कर सकता, मैं 25 साल से पत्रकारिता कर रहा हूं। जिस पर विधायक के पत्रकार का पक्ष ले रहे मीडियाकर्मी ने कहा कि जो कहना है, उससे ही कहना। किसी के पीछे, उसके बारे में बुरी बात करना ठीक नहीं है। कुछ समझदार मीडियाकर्मियों और पूर्व सीनियर डिप्टी मेयर मुकेश शर्मा ने किसी तरह कह सुनकर सभी को शांत करवाया।

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नगर निगम ने फरीदाबाद शहर को बना दिया कूड़े का ढेर – जसवंत पवार

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वैसे तो फरीदाबाद शहर को अब स्मार्ट सीटी का दर्जा प्राप्त हो चूका है, परन्तु शहर के सड़कों पर गंदगी के ढेर  फरीदाबाद प्रशासन और नगर को आइना दिखा रहे हैं

शहर के अलग अलग मुख्य चौराहों और सड़कों पर पढ़े कूड़े के ढेर को लेकर समाज सेवी जसवंत पवार ने फरीदाबाद प्रशासन और नगर निगम कमिश्नर से पूछा है कि एक तरफ भारत के प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी कहते हैं कि स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत मुहिम को पूरे देश में चला रहे हैं वही नगर निगम इस पर पानी फेरता दिख रहे हैं फरीदाबाद में आज सड़कों पर देखे तो गंदगी के ढेर लगे हुए हैं पूरे शहर को इन्होंने गंदगी का ढेर बना दिया है। जिसके चलते फरीदाबाद शहर अभी तक एक बार भी स्वछता सर्वेक्षण में अपनी कोई अहम् भूमिका अदा नहीं कर पा रहा,  अगर ऐसे ही चलता रहा तो हमारा फरीदाबाद शहर स्वच्छता सर्वे में फिर से फिसड्डी आएगा। साल 2021 में स्वछता सर्वेक्षण 1 मार्च से 28 मार्च तक किया जाना है जिसको लेकर लगता नहीं की जिला प्रसाशन व फरीदाबाद के नेता और मंत्री फरीदाबाद शहर की स्वछता को लेकर बिल्कुल भी चिंतित दिखाई नहीं पढ़ते है।

जसवन्त पंवार ने फरीदाबाद वासियों से अनुरोध और निवेदन किया है अगर हमें अपना शहर स्वच्छ और सुंदर बनाना है तो हम सबको मिलकर प्रयास करने होंगे जहां पर भी गंदगी के ढेर हैं आप वीडियो बनाएं सेल्फी ले फोटो खींचे और नेताओं और प्रशासन तक उसे पहुंचाएं, हमें जागरूक होना होगा तभी जाकर यह फरीदाबाद शहर हमारा स्वच्छ बन पाएगा। आप हमें इस नंबर पर वीडियो और फोटो भेज सकते हैं

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