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उद्धव ठाकरे की अयोध्या राजनीति

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Awadhesh kumar

whitemirchi.com

जबसे शिवसेना ने घोषणा की थी कि उद्धव ठाकरे अयोध्या का दौरा करेंगे तभी से इसका कई दृष्टिकोणों से विश्लेषण हो रहा था। यह प्रश्न उठ रहा था कि अयोध्या जाने का निर्णय उनको क्यों करना पड़ा? बाला साहब ठाकरे के स्वर्गवास के बाद शिवसेना की कमान थामे उनको छः वर्ष हो गए। इस बीच उनको अयोध्या आने की याद नहीं आई। अचानक उनकी अंतरात्मा में श्रीराम भक्ति पैदा हो गई हो तो अलग बात है। किंतु जिसके अंदर भक्ति पैदा होगी वह तिथि तय करके, उसकी पूरी तैयारी कराके नहीं आएगा। 24 नवंबर को उनके अयोध्या पहुंचने के काफी पहले से उनके 22 सांसद, लगभग सभी विधायक एवं प्रमुख नेता अयोध्या में उनके कार्यक्रमों की तैयारी तथा माहौल बनाने में जुटे थे। पूरे अयोध्या को इन्होंने शिवेसना के भगवा झंडे तथा नारों से पाट दिया था। शिवेसना की हैसियत या उद्धव ठाकरे का वैसा जनकार्षण नहीं है कि उनके दर्शन या स्वागत के लिए भीड़ उमड़ पड़े। बावजूद महाराष्ट्र से आए शिवेसना के उत्साही कार्यकर्ताओं ने कुछ समय के लिए वातावरण को उद्धवमय बनाने में आंशिक सफलता पाई। लक्ष्मण किला में पूजा तथा सरयू घाट पर आरती करते उद्धव, उनकी पत्नी तथा पुत्र की तस्वीरें लाइव हमारे पास आतीं रहीं। प्रश्न है कि क्या इतने से उनका उद्देश्य पूरा हो गया?

इस प्रश्न के उत्तर के लिए समझना होगा कि उनका उद्देश्य था क्या? अयोध्या आने के पहले मुखपत्र सामना में उन्होंने केन्द्र सरकार पर ही नहीं हिन्दू संगठनों पर भी तीखा प्रहार किया था। कहा गया कि मन की बात बहुत हो गई अब जन की बात हो। हिन्दू संगठनों से पूछा गया था कि मेरे अयोध्या आने से उनको परेशानी क्यों हो रही है? सरकार से पूछा गया था कि लगातार मांग करने के बावजूद सरकार अयोध्या पर चुप्पी क्यों साधी हुई है? बहुत सी बातें थी जिसे हम शिवसेना शैली मान चुके हैं। लक्ष्मणकिला में पूजा में उपस्थित प्रमुख संतों को देखकर उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा होगा। इसके बाद उन्होंने अपने संक्षिप्त भाषण में केन्द्र सरकार के बारे में कह दिया कि कुंभकर्ण तो छः महीना सोता था और उसके बाद जगता था यह तो स्थायी रुप से सोने वाला कुंभकर्ण है जिसे मैं जगाने आया हूं।

यह कह कुछ नहीं होता उसमें दम होना चाहिए, दिल चाहिए, ह्रदय चाहिए और वह मर्द का होना चाहिए उन्होंने सीधे प्रधानमंत्री पर हमला किया। मंदिर वहीं बनायेंगे तारीख नहीं बतायेंगे नहीं चलेगा हमें तारीख चाहिए। एक सहयोगी दल के नाते यह सरकार के मुखिया पर अविश्वास एवं तीखा प्रहार था। उसके बाद मांग वही थी, अध्यादेश या विधेयक लाएं। 25 नवंबर की पत्रकार वार्ता भी उनकी अत्यंत संक्षिप्त थी। उनको एवं रणनीतिकारों को पता था कि पत्रकार अनेक असुविधानजनक सवाल पूछेंगे जिनका उत्तर देना कठिन होगा। इसलिए एक छोटा वक्तव्य तथा तीन सवालों का जवाब देकर खत्म कर दिया। यह सवाल पूछा गया था कि उत्तर भारतीयों पर हमले होते हैं तो आप चुप रहते हैं जिसका वो संतोषजक जवाब दे नहीं सकते थे। आखिर राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के पूर्व आरंभिक दिनों में शिवेसना भी यही करती थी। उसकी उत्पत्ति सन्स औफ द स्वॉयल यानी महाराष्ट्र महाराष्ट्रीयनों के लिए विचार से हुआ था।

बहरहाल, उद्धव अपना संदेश देकर वापस चले गए। उन्होंने संत समिति द्वारा आयोजित विशाल सभा में भाग लेने की कोशिश भी नहीं की। उस पर एक शब्द भी नहीं बोला। यह भी उनकी स्वयं को सबसे अलग दिखाने रणनीति थी। शिवसेना एवं स्वयं उद्धव बालासाहब के बाद पहचान की वेदना से गुजर रहे हैं। बालासाहब ने परिस्थितियों के कारण क्षेत्रीयतावाद से निकलकर प्रखर हिन्दुत्ववादी नेता की छवि बना ली थी। उनकी वाणी में जो प्रखरता और स्पष्टता थी उद्धव उससे वंचित हैं। हिन्दुत्व के आधार पर ही शिवसेना राजनीति में प्रासंगिक रह सकता है तथा उद्धव भी। उद्धव के नेतृत्व में शिवसेना अंतर्विरोधी गतिविधियो में संलग्न रही है। जैन समुदाय के पर्व के समय मांस बिक्री पर प्रतिबंध का विरोध करते हुए शिवसैनिकों ने स्वयं मांस के स्टॉल लगाकर बिक्री की। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनसे पता चलता है कि शिवसेना भाजपा पर तो प्रहार करती है, लेकिन अपनी कोई निश्चित वैचारिक दिशा ग्रहण नहीं कर पा रही। भाजपा से अलग दिखाने के प्रयासों में उसकी स्वयं की विश्वसनीयता और जनाधार पर असर पड़ा है। इस कारण शिवसैनिकों की परंपरागत आक्रामकता में भी कमी देखी जा रही है।

इसका राजनीतिक असर भी हुआ है। भाजपा महाराष्ट्र में उसके छोटे भाई की भूमिका में थी। आज वैसी स्थिति नहीं है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 23 क्षेत्रों मे विजय मिली, जबकि शिवसेना को 18 में। यह परिणाम यथार्थ का प्रमाण था। किंतु शिवेसना उसे मानने को तैयार नहीं थी। शिवेसना ने कहा कि भाजपा की सीटें इसलिए ज्यादा हो गई क्योंकि हमारे मत उसके उम्मीदवारों को मिल गए हमारे उम्मीदवारों को उनके पूरे मत नहीं मिले। यह विश्लेषण सही नहीं था। अपने को साबित करने के लिए विधानसभा चुनाव में शिवसेना ने गठबंधन तोड़ दिया। परिणाम भाजपा ने 122 विधानसभा सीटों पर विजय पाई जबकि शिवसना 63 में सिमट गई। उसके बाद स्थानीय निकाय चुनावों में भी भाजपा का प्रदर्शन शिवसेना से बेहतर रहा।

शिवसेना अपनी स्थिति को मान ले तो शायद शांति से वह भाजपा के साथ मिलकर गठबंधन के नाते बेहतर एकजुट रणनीति बना सकती है। किंतु प्रदेश में बड़ा भाई बने रहने की उसकी सोच ऐसा होने के मार्ग की बाधा है। बालासाहब की अपनी छवि थी, जो उन्होंने परिस्थितियों के अनुरुप मुखर बयानों, सही रणनीतियों तथा कर्मों से बनाई थी। भाजपा भी उनका सम्मान करती थी। उन्होंने गठबंधन होने के बाद उद्धव और उनके साथियों की तरह कभी भाजपा पर प्रहार नहीं किया। अटलबिहारी वाजपेयी एवं लालकृष्ण आडवाणी से उनके व्यक्तिगत रिश्ते थे। संध के अधिकारियों से भी वे संपर्क में रहते थे। उद्वव ऐसा नहीं कर पा रहे हैं और अपनी अलग पहचान बनाने की अकुलाहट में प्रदेश एवं केन्द्र सरकार में होते हुए भी वे एवं उनके लोग विपक्ष की तरह आक्रामक बयान दे रहे हैं।

उनके अयोध्या आगमन को इन्हीं परिप्रेक्ष्यों में देखना होगा। श्रीराम मंदिर निर्माण की इच्छा उद्धव के अंदर होगी, लेकिन यह यात्रा राजनीतिक उद्देश्य से किया गया था। अयोध्या का मामला संघ, संत समिति एवं विश्व हिन्दू परिषद के कारण फिर चरम पर पहुंच गया है। उद्धव को लगा है कि प्रखर हिन्दुत्व नेता की पहचान तथा पार्टी के निश्चित विचारधारा का संदेश देने के लिए यह सबसे उपयुक्त अवसर है। इसमें रास्ता यही है कि भाजपा को राममंदिर पर कठघरे में खड़ा करो और स्वयं को इसके लिए पूर्ण समर्पित। यही उन्होंने अयोध्या में किया। उन्होंने कहा कि भाजपा चुनाव के समय राम-राम करती है और चुनाव के बाद आराम। उसके बाद वे और तल्ख हुए। कह दिया कि भाजपा रामलला हम आयेंगे मंदिर वहीं बनायेंगे को पूरा करे या लोगों को कह दे कि यह भी एक चुनावी जुमला था। उन्होंने बार-बार अयोध्या आने का ऐलान किया। देखना होगा कि आगे वे आते हैं या नहीं। किंतु साफ है कि जब तक सरकार कोई कदम नहीं उठाती वो इसी तरह आक्रामकता प्रदर्शित करते रहेंगे। किंतु उद्धव भूल गए कि भाजपा की तरह वे भी कठघरे में है।

यह सवाल उन पर भी उठेगा कि इतने दिनों तक उन्हें श्रीराम मंदिर निर्माण की याद क्यों नहीं आई? उनके सांसद संयज राउत दावा कर रहे थे कि रामभक्तों ने 17 मिनट 18 मिनटा या आधा घंटा में काम तमाम कर दिया। उस समय शिवसेना आंदोलन में कहां थी? यह सफेद झूठ है कि शिवसैनिकों ने बाबरी ध्वस्त किया। वो उन शिवसैनिकों को सामने लाएं। जितनी छानबीन हुई उसमें शिवसैनिको का नाम कहीं नहीं आया। भाजपा 1992 तक तो आंदोलन में समर्पण से लगी थी। 1998 तक घोषणा पत्र के आरंभ में इसे शामिल करती थी। शिवेसना ने कभी ऐसा नहीं किया। यदि उद्धव में श्रीराम मंदिर निर्माण को लेकर इतनी ही उत्कंठा थी तो उनको उच्चतम न्यायालय में अपने वकील खड़ाकर त्वरित और प्रतिदिन सुनवाई की अपील करनी चाहिए थी। वे प्रधानमंत्री से मिल सकते थे। अपने लोगों को मस्जिद पक्षकारों से बात करने के लिए नियुक्त कर सकते थे। इनमें से कुछ भी उन्होंने नहीं किया। जनता पूरी भूमिका का मूल्यांकन करेगी। अयोध्या आकर पूजा, आरती की औपचारिकता तथा मंदिर के लिए अध्यादेश की माग एवं प्रधानमंत्री की निंदा से वे बालासाहब की तरह महाराष्टृर में हिन्दू ह्रदय सम्राट की छवि नहीं पा सकते।

अवधेश कुमार  ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्पलेक्स, दिल्ली

9811027208

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किसानों की कर्ज माफी समाधान से ज्यादा समस्या

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Awadhesh kumar

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इसका उत्तर देने के लिए कई पहलुओं पर गंभीरता से विचार करना होगा। पार्टियां और सरकारें सभी किसानों के कर्ज माफी की घोषणा करती हैं, पर सारे किसान इसके दायरे में नहीं आते, न ही सारे कर्ज। उदाहरण के लिए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि 30 नवंबर 2018 की स्थिति के अनुसार सहकारी बैंक व छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंक में कृषकों के अल्पकालीन ऋण को माफ कर दिया गया। इन दो श्रेणियों के बैंकों से जिन किसानों ने अल्पकालिक कर्ज लिया होगा उनका ही बोझ उतरेगा। अधिसूचित वाणिज्यिक बैंकों के अल्पकालीन कृषि ऋण के परीक्षण के बाद कृषि कर्ज को माफ करने की कार्रवाई की जाएगी। राजस्थान में गहलोत के शब्दों में किसानों का सहकारी बैंकों का सारा कर्ज माफ किया जाएगा तथा वाणिज्यिक, राष्ट्रीयकृत व ग्रामीण बैंकों में कर्जमाफी की सीमा दो लाख रुपये रहेगी। गणना के लिए 31 नवंबर 2018 की समयसीमा तय की गई है। इससे खजाने पर करीब 18000 करोड़ रुपये का बोझ आएगा। मध्यप्रदेश में घोषणा हो गई लेकिन राज्य स्तर से लेकर जिला स्तर तक गठित समितियों की रिपोर्ट के आधार पर पात्रता और मापदंड तय होंगे और उसके बाद कर्ज माफी प्रमाण पत्र वितिरत किए जाएंगे। कहने का तात्पर्य यह कि चुनावी वायदा करने के बाद यथार्थ का सामना करना पड़ता है और माफी की राजनीतिक घोषणा के बावजूद इसका क्रियान्वयन वैसे ही नहीं होता जैसी कल्पना की जाती है। इसके रास्ते अनेक समस्यायें सामने आतीं हैं। इनमें प्रदेश की माली हालत सर्वप्रमुख है।

अगर राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा हुआ तो स्थिति कितनी विकट होगी इसकी कल्पना करिए। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए 1 सरकार ने 2008 में 3.73 करोड़ किसानों के 52,260 करोड़ रुपया कर्ज माफ किया था। वित्तीय स्थिति पर उतनी राशि का भी असर पड़ा। आज की स्थिति क्या है? वित्त मंत्रालय की तरफ से 17 दिसंबर को संसद में बताया गया कि वर्ष 2017-18 में 7.53 लाख करोड़ रुपये का फसल कर्ज दिया गया। वर्तमान वित्त वर्ष का आंकड़ा नहीं आया है, लेकिन यह 9 लाख करोड़ रुपये के आसपास है। हमारा कुल बजट 24 लाख करोड़ रुपये का है। अगर यह पूरी राशि माफ कर दी जाए तो राजकोषीय घाटा कुछ समय के लिए सीधे 7 प्रतिशत के आसपास पहुंच जाएगा। यह किसी भी खजाने के लिए खतरे की घंटी होती है। केवल छोटे और सीमांत किसानों का माफ किया गया तो क्या होगा? किसान कर्ज में सीमांत व छोटे किसानों की हिस्सेदारी लगभग 80 प्रतिशत होती है, लेकिन संस्थागत कर्ज में उनकी हिस्सेदारी 60 प्रतिशत है। इसके अनुसार भी हिंसाब लगाये तो 5 लाख करोड़ से ज्यादा की राशि चाहिए। यह देश के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग तीन प्रतिशत है। यही राजकोषीय स्थिति को चरमरा देगा। कहने की आवश्यकता यह कि राजनीतिक लोकप्रियतावाद का यह अतार्किक होड़ आत्मघाती है। एक राज्य में कर्ज माफी के वादे का असर देश भर में पड़ता है और लोग कर्ज वापस करना बंद कर देते हैं। कांग्रेस की घोषणा के बाद बैंकों ने वित्त मंत्रालय के समक्ष यह बात उठाई थी कि छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान से किसानों से कर्ज वसूलना मुश्किल हो गया है। लोग सोचते हैं कि माफ होना ही है तो कर्ज वापस करने की आवश्यकता क्या है। यूपीए सरकार द्वारा वर्ष 2008 में कर्ज माफी के बाद दो वर्षों तक कृषि कर्जों की वसूली कठिन हो गई थी। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों को देखें तो वर्ष 2012 में कृषि क्षेत्र में फंसे कर्जे यानी एनपीए की राशि 24,800 करोड़ रुपये थी जो 2017 में बढ़ कर 60,200 करोड़ रुपये हो गई। आगे भी ऐसे ही होने का खतरा बढ़ गया है। कृषि का नाम पर लिए गए कर्ज के अधिकांश भाग का एनपीए बनना तय है।

निस्संदेह, वास्तविक किसानों की दशा बुरी है और उनकी पीठ पर हाथ रखने की आवश्यकता है। किंतु कर्ज माफी समाधान नहीं समस्या है। ग्रामीण कर्ज पर हुए अध्ययनों से पता चलता है कि छोटे और सीमांत किसानों पर कर्ज का बोझ काफी है लेकिन उनमें से ज्यादा गैर बैंकिंग स्रोतों से लिया गया है। छोटा किसान बैंक के दरवाजे पर आज भी नहीं जाता है। वे आसपास के लोगों से कर्ज लेते हैं। इनको माफी से लाभ नहीं। कर्ज माफी की अपसंस्कृति के कारण गांव-गांव में धूर्त लोग कृषि के नाम पर कर्ज लेकर लौटाने की नहीं सोचते। 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार द्वारा कर्ज माफी के बाद से यह चरित्र पैदा हुआ है। सरकारों के पास ऐसी कोई मशीनरी नहीं जो पता कर सके कि किन किसानों के पास गैर बैंकिंग कर्ज कितना है। यह भी पता नहीं किया जाता कि कृषि के नाम पर लिए गए कर्ज में कितने वाकई कृषि के लिए ही लिया गया। उनमें कितनों की दशा कृषि के कारण बुरी है और उनको माफी की आवश्यकता है। इस तरह इससे वास्तविक किसानों का अत्यंत कम लाभ मिलता है।

माफ करने के बाद सरकारों को बैंकों को राशि चुकानी होती है। जाहिर है, माफ की गई राशि की पूर्ति सरकारें करों से ही करती है। हम आप जो कर देंगे उनसे ही इसकी पूर्ति की जाएगी। तो भार हमारे-आपके सिर ही आना है। अगर इससे वास्तविक किसानों का वास्तविक भला होता तो एक बार भार झेल लेने में समस्या नहीं थी। किंतु कर्जमाफी से किसानों की दशा सुधरी हो इसके कोई प्रमाण नहीं है। इसकी जगह किसानों की दशा सुधारने के लिए कृषि से संबंधित मूलभूत संरचना और संसाधन विकसित हों। कृषि सम्मान का पेशा बने, उसकी लागत कम हो, बीज, उर्वरक और सिंचाई तो उचित मूल्य पर उपलब्ध हो ही फसलों का उचित मूल्य भी मिले, कृषि बीमा योजना व्यवाहारिक रुप से लागू हो, आम आवश्यकता की सेवाएं यानी स्वास्थ्य, शिक्षा आदि तथा वस्तुएं उनको उचित मूल्य पर उपलब्ध हों……इन सबकी व्यवस्था हो। कर्ज माफी की राशि इन पर खर्च हो तो उसका स्थायी लाभ मिलेगा। सबसे बड़ी समस्या कृषि श्रमिकों की अनुपलब्धता है। यह बहुत बड़ा खर्च भी है। यदि मनरेगा को खेती से संबद्ध कर दिया जाए तो लघु और सीमांत किसानों का श्रमिकों का संकट दूर होगा और बहुत बड़ी राशि बचेगी।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर,

पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः 110092

दूरभाषः 01122483408, 9811027208

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अशांति फैलाने वाले पाकिस्तान को क्यों याद आ रही शांति

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Pushpanjali

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भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध भले ही भारत और पाकिस्‍तान को आजादी मिल गई हो लेकिन आज भी दोनों देश एक-दूसरे की नफरत में जकड़े हुए हैं| आजादी के बाद से अब तक भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध चार बार हो चूका है लेकिन फिर भी पाक के दिमाग में ये बात नहीं बैठती है कि वो भारत का मुकाबला करने के काबिल नहीं है और अमन और शांति का रास्‍ता ही सबसे सही है| भारत के लिए अपने दिल में नफरत पाले पाकिस्‍तान हर बार कुछ ना कुछ नापाक करता रहता है इसलिए कभी ना कभी इन हरकतों की वजह से युद्ध छिड़ सकता है| आज पाक के रुख को देखकर आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि वो कभी भी लड़ने को तैयार रहता है और ऐसे में हर समय दोनों पड़ोसी देशों के बीच युद्ध का मंजर बना रहता है| भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध जब होगा तो बहुत करोड़ों रुपयों का नुकसान होगा साथ ही आर्थिक तंगी के दलदल में दोनों ही देश फंस सकते हैं| अब तक जो चार युद्ध हुए हैं उसमें पाकिस्‍तान ने अपनी 13880 के लगभग सैनिको की जान गंवाई थी और भारत के लगभग 8750 सैनिक मारे गए थे|

केवल नारे देते हैं बेटियां अब भी नहीं सुरक्षित

नोबल पुरस्‍कार विजेता इंटरनेशनल ऑफ न्‍यूक्‍लियर वॉर तथा फिजीशियन रिस्‍पॉन्सिबिलिटी के द्वारा करवाए गए एक अध्‍ययन के अनुसार भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध विश्‍वयुद्ध हो सकता है और उस युद्ध से पूरी मानव जाति तक खत्‍म हो सकती है| अब तो आप समझ ही गए होंगें कि भारत और पाकिस्‍तान के बीच अगर युद्ध होता है तो उसका अंजाम कितना भयंकर होगा| भले ही आज पाकिस्‍तान ने बहुत तरक्‍की कर ली हो लेकिन फिर भी वो कई मामलों में भारत से पीछे ही है| वहां पर महिलाओं को इतनी आज़ादी नहीं है जितनी भारत में है| भले ही भारत भी महिलाओं की सुरक्षा के मामले में फेल हो लेकिन यहां पर महिलाओं के हक और अधिकार का हनन नहीं होता है| भारत में शिक्षा के ऊपर पाकिस्‍तान से तो ज्‍यादा ही ध्‍यान दिया जाता है| पाक में मदरसों के अंदर छोटे बच्‍चों को हथियार चलाना सिखाया जाता है बल्कि भारत में बच्‍चों को भगवान का रूप माना जाता है| पाकिस्‍तान में महिलाओं के साथ-साथ बच्‍चों की स्थिति भी बहुत खराब है| वहां पर उनके अधिकारों का हनन कर उन्‍हें अच्‍छी तालीम से वंचित कर दिया जाता है| कई जगहों पर तो आंतकी तालीम भी दी जाती है|

भ्रष्टाचार दूर करने की बजाय, विरोध दबा रही सरकार

पाकिस्‍तान एक इस्‍लामिक देश है इसलिए वहां पर मर्दों को एक से ज्‍यादा विवाह करने की छूट है और वहां पर तीन तलाक भी खूब जोरो से चलता है जबकि हाल ही में महिलाओं के विरोध पर भारत में तीन तलाक को बैन कर दिया गया है| इस तीन तलाक की वजह से ना जाने कितने ही घर उजड़ गए और कितने ही बच्‍चे अनाथ हो गए| पाक में भी भी ये सिलसिला जारी है| कई मामलों में पाकिस्‍तान भारत से पिछड़ा हुआ है और उसकी आर्थिक स्थिति भी कुछ बहुत ज्‍यादा अच्‍छी नहीं है लेकिन फिर भी उसे ना जाने किस बात का घमंड है जो वो दोस्‍ती का रिश्‍ता नहीं बना सकता है|

पाक‍िस्तानी ह‍िस्से में करतारपुर साहिब कॉरिडोर की आधारशिला रखी गई जोकि एलओसी से करीबन साढ़े तीन किलोमीटर दूर सिखों के लिए यह आस्था का बड़ा केंद्र है| दोनों देशों के बीच तनाव के चलते इस गलियारे को अब तक नहीं खोला जा सका था| हर सिख की यही मांग थी जो 70 साल नहीं हो पाया, वो अब पूरा हुआ है| गुरु नानक साहब ने अपना आखिरी समय जिस धरती पर बिताया, उस 4 किमी का ये फासला पूरा करने में 70 साल लग गए| पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान का कहना है कि जब मैं सियासत में आया तो ऐसे लोगों से मिला जो बस अपने लिए ही काम करते थे, आवाम को भूल जाते थे एक दूसरे किस्म का राजनेता है तो नफरतों के नाम पर नहीं बल्कि काम के नाम पर राजनीति करता था| आज जहां पाकिस्तान-हिंदुस्तान खड़े हैं, 70 साल से ऐसा ही हो रहा है| दोनों तरफ गलतियां हुईं लेकिन हम जब तक आगे नहीं बढ़ेंगे, जंजीर नहीं टूटेगी|

सरकार जनता के मत से चलेगी सियासतदानों के मन से नहीं

इमरान खान का कहना है कि हम एक कदम आगे बढ़कर दो कदम पीछे हट जाते हैं| हममें ये ताकत नहीं आई है कि कुछ भी हो हम रिश्ते ठीक करेंगे| अगर फ्रांस-जर्मनी एक साथ आ सकते हैं, तो फिर पाकिस्तान-हिंदुस्तान भी ऐसा क्यों नहीं कर सकते है| हमने भी एक-दूसरे के लोग मारे हैं, लेकिन फिर भी सब भूला जा सकता है| हमेशा कहा जाता था कि पाकिस्तान की फौज दोस्ती नहीं होने देगी, लेकिन आज हमारी पार्टी-पीएम-फौज एक साथ हैं| इमरान ने कश्मीर पर बोलते हुए कहा क‍ि हमारा मसला सिर्फ कश्मीर का है| इंसान चांद पर पहुंच चुका है लेकिन हम एक मसला हल नहीं कर पा रहे हैं| ये मसला जरूर हल हो जाएगा| इसके लिए पक्का फैसला जरूरी है अगर हिंदुस्तान एक कदम आगे बढ़ाएगा तो हम दो कदम आगे बढ़ाएंगे|

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भ्रष्टाचार दूर करने की बजाय, विरोध दबा रही सरकार

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जो विदेशों से काले धन लाने के मुद्दे पर सत्ता में आये थे, उनकी सरकार में देश का सूरत-ए हाल यह है कि पिछले 2 साल में देश में भ्रष्टाचार का ग्राफ तेजी से बढ़ा है आय दिन देशमें ऐसे मसलें होते हैं जिसे बिहार में नितीश सरकार उत्तर प्रदेश में योगी सरकार और तो और बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा देने वाली मोदी सरकार भी चुप्पी साधें हुए है ऐसे में एक सर्वे के अनुसार देश के 13 राज्यों के 75 प्रतिशत परिवारों का मानना है कि पिछले दो साल के दौरान भ्रष्टाचार या तो बढ़ा है या पुराने स्तर पर टिका रहा है| वहीं 27 प्रतिशत ने पिछले एक साल के दौरान किसी सार्वजनिक सुविधा के लिए घूस देने की बात स्वीकार की गैर लाभकारी संगठन सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमएस) द्वारा किए गए सर्वेक्षण ‘इंडिया करप्शन स्टडी’ में 13 राज्यों आंध्र प्रदेश, बिहार, दिल्ली, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल के 200 से अधिक ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों के दो हजार से अधिक लोग शामिल हुए|

वहीं सर्वेक्षण में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस), बिजली, चिकित्सा, न्यायिक सेवाएं, भूमि-आवास, परिवहन, महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना शामिल रहे|सीएमएस के सर्वेक्षण के अनुसार 13 राज्यों में लोगों ने इन सेवाओं के लिए इस दौरान 25 सौ से 28 सौ करोड़ रुपए के घूस दिए| उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह ने सीएमएस के चेयरमैन डॉ एन भाष्कर राव के साथ रिपोर्ट में कहा कि लोगों ने पहचान पत्र बनवाने के लिए भी घूस देने की बातेंस्वीकार की| करीब सात प्रतिशत लोगों ने आधार कार्ड बनवाने तथा तीन प्रतिशत लोगों ने मतदाता पहचान पत्र बनवाने के लिए घूस देने की बातें स्वीकार की|

इसके अलावा सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को रातों रात मोदी सरकार ने छुट्टी पर भेज दिया इसमें भी उनका कोई ऐसा ही मसला हैं जो जनता के सामने नहीं आने देना चाहतेथे इसलिए उन्होंने ऐसा करना ठीक समझा जैसा की सीबीआई डायरेक्टर की नियुक्ति 3 लोगों की समिति करती है| पीएम, नेता विपक्ष और सीजेआई| सीबीआई डायरेक्टर कोपीएम ने रात 2 बजे हटाया, यह भारत के संविधान, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया, विपक्ष के नेता और भारत के लोगों का अपमान है| आलोक वर्मा को रात के 2 बजे छुट्टी पर भेजेजाने को राफेल डील में कथित भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने की कोशिश है प्रधानमंत्री जानते हैं कि यदि राफेल की जांच शुरू हो गई तो वह खत्म हो जाएंगे और यही उनकी घबराहटहै| अगर सीबीआई जांच शुरू हो जाती तो दूध का दूध, पानी का पानी हो जाता और इससे घबराकर, डरकर प्रधानमंत्री ने सीबीआई डायरेक्टर को हटा दिया | वहीं प्रधानमंत्रीसिर्फ सीबीआई डायरेक्टर को हटा नहीं रहे हैं बल्कि, सबूतों को मिटाने का काम भी कर रहे हैं| ये देश प्रधानमंत्री को उनके भ्रष्टाचार को भूलने नहीं देगा|

यह सच है कि भारतमहाशक्ति बनने के करीब है परन्तु हम भ्रष्टाचार की वजह से इस से दूर होते जा रहे हैभारत के नेताओ को जब अपने फालतू के कार्यों से फुरसत मिले तब ही तो वो इस सम्बन्धमें सोच सकते है वर्ष 2014 में केंद्र में जब नरेंद्र मोदी की सरकार बनी तो भारतीय जनता को एक आस जगी की शायद अब भारत में भ्रष्टाचार दूर होगा युवाओं को रोज़गार मिलेगा लेकिन भाजपा सरकार लोगों के इस आस को कायम नहीं कर पाई केंद्र में भाजपा सरकार की 5 साल की कार्यकाल पूरे होने को आए लेकिन न तो  देश में भ्रष्टाचार थमने का नाम ले रहा न ही पढ़े-युवाओं को रोज़गार मिल पाया ऐसे में अब और क्या आस इस सरकार से लगाई जा सकती है देश के महाशक्ति बनने में जो रोडा है वो है भारतीयनेता| युवाओ को इस के लिये इनके खिलाफ लडना पडेगा, आज देश को महाशक्ति बनाने के लिये एक महाक्रान्ति की जरुरत है, क्योकि बदलाव के लिये क्रान्ति की हीआवश्यकता होती है लेकिन इस बात का ध्यान रखना पडेगा की भारत के रशिया जैसे महाशक्तिशाली देश की तरह टुकडे न हो जाये, अपने को बचाने के लिये ये नेता कभी भी रूपबदल सकते है| जिसके लिए भारत के हर नागरिक को जागने की जरूरत है|

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