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ये लेख राजस्थान में चुनावी प्रचार का संदेश

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Lalit Garg

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राजस्थान में विधानसभा चुनाव 2018 के लिए मतदान का काउंटडाउन शुरू हो चुका है। मतदान के लिए अब कुछ दिन शेष रहे हैं। यही कारण है कि चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में बीजेपी, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक दल, भारत वाहिनी पार्टी समेत तमाम दल और निर्दलीय उम्मीदवारों ने प्रचार में अपनी पूरी ताकत झोंक दी हैं। लेकिन हर क्षण बदलते राजनीतिक समीकरण कांग्रेस की जीत को हार की ओर ले जा रहे हैं। दो-तिहाई सीटों की जीत के साथ आगे बढ़ रही कांग्रेस पार्टी के लिये स्पष्ट बहुमत मिलना भी जटिल होता जा रहा है, क्या यह मोदी का जादू है या कांग्रेस पार्टी का चुनावी प्रचार का विसंगतिपूर्ण होना। यह स्थिति बनने का कारण आपसी मतभेद या मुख्यमंत्री पद की दावेदारी का प्रश्न है या राहुल गांधी की अस्वीकार्यता? जो भी स्थिति बनी हो, लेकिन कांग्रेस को उस पर मंथन करना चाहिए।

राजस्थान में प्रचार के अन्तिम दौर में भाजपा-कांग्रेस ने एक-दूसरे पर हमले तेज कर दिए हैं। जोधपुर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राहुल गांधी के हिंदुत्व वाले बयान समेत कई मुद्दों पर कांग्रेस को घेरा। बीते दिनों राहुल गांधी ने पीएम मोदी पर हल्ला बोलते हुए कहा था कि वे किस तरह के हिंदू हैं। इसका जवाब देते हुए मोदी ने कहा कि हिंदुत्व का ज्ञान देने वाले मेरी जाति पूछते हैं। हिंदुत्व हिमालय से भी ऊंचा और समंदर से भी गहरा है। ऋषि-मुनियों ने भी कभी दावा नहीं किया कि उन्हें हिंदुत्व और हिंदू का पूरा ज्ञान है। मैं ऐसा दावा नहीं कर सकता, नामदार कर सकते हैं। मोदी को हिन्दुत्व का ज्ञान है या नहीं, लेकिन लगता है कि राजस्थान में इसीे मुद्दे पर वोट पड़ने वाले है। मुझे लगता है कि कांग्रेस सहित विपक्षी दलों को अब यह समझ लेना चाहिए कि यह चुनाव एवं आने वाले चुनाव हिन्दुत्व के मुद्दे पर ही हार-जीत को तय करेंगे। हिन्दू राष्ट्र में हिन्दुत्व की उपेक्षा कब तक सहनीय होगी? शायद इस बात की गहराई को कांग्रेस समझने लगी है तभी वह भी हिन्दुत्व को मुद्दा बनाने की कोशिश कर ही है। भाजपा के हिन्दुत्व की काट के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी दत्तात्रेय ब्राह्मण के अवतार के रूप में स्वयं को प्रस्तुत कर रहे हैं। कभी वे मन्दिर की चैखट चढ़ रहे हैं तो कभी हिन्दू धर्मगुरुओं का सहारा ले रहे हैं। कुछ भी हो भाजपा के नेता जहां मानकर चल रहे हैं कि पीएम मोदी के प्रचार के लिए आने के बाद लड़ाई दिलचस्प हो गई है, वहीं कांग्रेस पार्टी के नेताओं को जीत का पूरा भरोसा भी लडखड़ाता दिख रहा है।

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सत्य तो यह भी है कि राजस्थान में चुनावी हवाओं में वसुंधरा राजे और उनकी सरकार को लेकर विरोधी लहर के स्वर भी व्यापक है। लेकिन पूरे राजस्थान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जनता का जुड़ाव बना हुआ है। उनकी जनसभाओं में जमकर भीड़ उमड़ रही है। बताते हैं कि  प्रदेश के हर हिस्से से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मांग भी बहुत देखने को मिली है। पिछले दो सप्ताह के दौरान राजस्थान में भाजपा की स्थिति काफी मजबूत हुई है। इसकी वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रचार में उतरना रहा है और उनके द्वारा हिन्दुत्व को प्रभावी मुद्दे के रूप में प्रस्तुति देना रहा है। राज्य में मुख्यमंत्री के चेहरे की बात करें तो पहले नंबर पर राज्य के लोगों की पसंद अशोक गहलोत हैं। दूसरे नंबर पर वसुंधरा राजे और उन्हीं के आसपास सचिन पायलट की छवि है। राज्य की जनता प्रधानमंत्री से नाराज नहीं है। हां, वसुंधरा सरकार से नाराजगी जरूर है।

राजस्थान में कांग्रेस ने जीती पारी को हार की ओर धकेला है। यदि यह चुनाव अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में आगे लाकर लड़ा जाता तो जीत की संभावनाएं कायम रहती। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट टोंक विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। उनके मुकाबले में भाजपा के एकमात्र अल्पसंख्यक उम्मीदवार वसुंधरा सरकार में मंत्री रहे यूनुस खान हैं। टोंक में मुस्लिम आबादी भी ठीक-ठाक है। यूनुस खान का रिकॉर्ड भी दुरुस्त है। वह वसुंधरा सरकार में अच्छा काम करने वाले मंत्रियों में हैं। क्षेत्र की जनता भी उनपर भरोसा करती है। वह वसुंधरा की भी पसंद बताए जाते हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि टोंक में  भाजपा और कांग्रेस में कड़ा मुकाबला हो गया है। सचिन पायलट के लिए यह सीट जहां प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई है, वहीं भाजपा ने उन्हें पूरी तरह से घेर कर रखने की रणनीति को और तेज धार दे दी है।

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम जो भी हो, लेकिन यह स्पष्ट संकेत हैं कि कांग्रेस पुनर्जीवित हो रही है। लेकिन पुनर्जीवित होना जीत की गारंटी नहीं है। क्योंकि चुनावी राजनीति में ‘जो जीता वही सिकंदर’ होता है। लेकिन परिवर्तन की इच्छा का संकेत मिलना इस पार्टी के शुभ भविष्य का द्योतक है।  अब कांग्रेस को अपनी सोच एवं कार्यक्रमों में बडे़ बदलाव जारी रखने होंगे।  2019 के लोकसभा चुनाव का नतीजा इस बात पर निर्भर करेगा कि कांग्रेस स्वयं को कितना बदलती है, कितनी मजबूत होती, कितना अपनी गलतियों को सुधारती है, इसी पर स्थितियां और भी करवट लेंगी।

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पांच राज्यों के नतीजे क्या होंगे? कैसे होंगे? चार राज्यों में मतदान हो चुके हैं और राजस्थान में मत अभी पड़ेंगे। कौन जीतेगा? कौन हारेगा? यह मायने रखता है- लेकिन इससे भी ज्यादा मायने रखता है कि इस बार जो लोगों की आकांक्षाएं बनी हैं, वह कौन, किस तरह पूरी करेगा? जनमत का फलसफा यही है और जनमत का आदेश भी यही है कि चुने हुए प्रतिनिधि मतदाताओं के मत के साथ उनकी भावनाओं को भी उतना ही अधिमान दें। मतदाताओं को लुभाने एवं ठगने की मानसिकता बहुत हो चुकी है, वह अब समझदार हो चुका है। मतदाताओं की भावनाओं से खिलवाड़ करने की स्थितियों पर नियंत्रण करके ही सही अर्थों में लोकतंत्र का स्वरूप बनेगा अन्यथा असंतोष किसी न किसी स्तर पर व्याप्त रहेगा।

लोग राजनीति, अर्थनीति, समाजनीति यहां तक कि गृहनीति में भी परिवर्तन चाहते हैं। इसका माध्यम जन प्रतिनिधियों को चुनकर या बदल कर भेजना ही एक मात्र हथियार उनके पास रह जाता है। पर केवल राजनीतिज्ञ ही क्या यह कर पाएंगे? तो फिर उनसे ही इतनी अपेक्षाएं क्यों बन जाती हैं। आवश्यक है राजनेताओं, जितना महत्व उन प्रथम पंक्ति के व्यक्तियों का भी स्थापित हो, जो राजनीति से इतर अन्य क्षेत्रों में जीवन खपाए हुए हैं।

इस बार चुनाव में धार्मिक और साम्प्रदायिक भावनाओं को बहुत उभारा गया। परोक्ष और अपरोक्ष रूप से लगभग सारी चुनावी रणनीति और लगभग सारी पार्टियां धर्म, जाति और भाषा के चारों तरफ कुंडली मार कर बैठी रहीं। बेशुमार धन व साधनों का प्रयोग हुआ। नीति और कूटनीति चली। इस दिशा में कोई साफ एवं स्वस्थ स्तर नहीं रहा। ”खेत कभी झूठ नहीं बोलता“- जो देंगे, वही वापस मिलेगा। कोई भी चुना जाए, सभी भारतीय समाज के हैं, अपने में से ही हैं, समाज के प्रतिबिम्ब हैं। समाज से भिन्न कल्पना भी मात्र कल्पना होगी। हम यह नहीं चाहेंगे कि नीतियां, प्रणालियां बदलें चाहे न बदलें, प्रतिनिधि बदल जायेंगे। जायज  यह होगा कि नीतियां और प्रणालियां बदल जायेंगे क्योंकि प्रतिनिधिस्वरूप तो पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों में वही चेहरे हैं जो अब तक देखते आए हैं। नये चेहरे नहीं के बराबर हैं। अतः विकल्प और चयन सिमटा हुआ है।

ऊँट की मृत्यु बना बैराग्य का कारण

करोड़ों देशवासियों की भी अपनी किस्मत है, हम तो मंगल की ही कामना कर सकते हैं कि राजस्थान या शेष चार राज्यों में कोई भी आये, चाहे भाजपा आये या कांग्रेस या अन्य- पर मर्यादा आये, सहिष्णुता आये, ईमानदारी आये, प्रामाणिकता आये, राष्ट्रीय चरित्र आये। ईमानदार एवं चरित्रवान नेतृत्व ही लोकतंत्र को सुदृढ़ता दे सकेगा।

(ललित गर्ग)
बी-380, निर्माण विहार, दूसरा माला दिल्ली-110092
मो: 9811051133
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सुशांत अपनी बहन और परिवार से नाराज थे – केआरके

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डेस्क | स्वर्गीय सुशांत सिंह राजपूत की गर्लफ्रेंड रिया चक्रबर्ती ने सुशांत के साथ की चैट मीडिया में वायरल की है|
इस चैट में उन्होंने यह बोला कि सुशांत सिंह राजपूत अपने बहन प्रियंका और अपने परिवार से बहुत नाराज़ थे| सोशल मीडिया पर सभी ने रिया पर नाराजगी जाहिर की। इस बीच कमाल राशिद खान ने रिया के चैट शेयर करने पर एक्ट्रेस पर निशाना साधा है।  केआरके ने ट्वीट किया, ‘रिया चक्रवर्ती तुम्हारा कहना है कि सुशांत सिंह राजपूत अपने परिवार की शक्ल भी नहीं देखना चाहता था। क्या यह सच है?
एक पिता का अकेला बेटा और 4 बहनों का प्यारा भाई अपने परिवार से नहीं मिलना चाहता था। क्या तुम सही कह रही हो ड्रामा क्वीन? और कितना गिरोगी? अब तो शर्म करो।’

ईडी ने रिया से 8 घंटे तक पूछताछ की और रिया के भाई शैविक से 18 घंटे तक पूछताछ चली|  11 अगस्त सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई तय की है|

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खट्टर ने क्यों कहा, हर भारतीय के लिए यह सुखद क्षण

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डेस्क | राम मंदिर जन्मभूमि पूजन के अवसर पर हरियाणा की मुख़्यमंत्री मनोहर लाल खटटर ने ट्वीट करते हुए कहा, यह सुखद क्षण हर भारतीय के लिए ऐतिहासिक है।  उन्होंने लोगों से अपने घरों के आंगन में दीपक जलाने और भाईचारे का संदेश देने का आग्रह किया। उन्होंने सियावर रामचंद्र की जय और जय श्री राम का नारा बोलते हुए ट्वीट कर अपनी खुशी व्यक्त की।

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दिल, दोस्ती, यारी यानि बहुत पर्सनल बात है

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सिद्धि वर्मा| आप सभी लोग दोस्त, दोस्ती, यारी आदि शब्दों को बहुत ही सुनते, लिखते, पढ़ते आये हो| लोग अपनी अच्छी दोस्त या दोस्ती के बारे में लिखते हैं| सोशल मीडिया पर उनके साथ तस्वीरें, कैप्शन, टैग सब कुछ करते हैं और फिर एक अचानक ऐसा कुछ होता कि आपकी दोस्ती टूट जाती है या दूर हो जाते हो, बातें बंद हो जाती हैं| 

आपको पता है इसका क्या कारण है- इसका यह कारण है कि हम हद से ज्यादा विश्वास कर लेते हैं, उनपर आश्रित हो जाते हैं| 

ऐसा क्यों होता है? और कब होता है? 

देखिये, यह बात तो सच ही है जब दो अच्छे गहरे दोस्तों के बीच कोई अन्य तीसरा आ जाये तो वहाँ बैंड बज जाती है क्योंकि कोई भी यह नहीं चाहता है कि हमें छोड़कर हमारी इम्पोर्टेन्स किसी और को दी जाये| लेकिन यह बात भी तो सोचने समझने जानने वाली है कि हमेशा हर कोई हर किसी को एक जैसी वैल्यू नहीं दे सकता है| इसीलिए रियलिटी को एक्सेप्ट करके हमें उस दोस्ती में कोई भी किसी के भी प्रति ईर्ष्या, नफरत की भावना नहीं लानी चाहिए| 
अब आपके मन में यह सवाल जरूर उठ रहा होगा कि अगर गलती एक की है और हमने कुछ भी गलत नहीं किया तो फिर आपको उस समय उस दोस्ती, बंधन से अलग हो जाना चाहिए| क्योंकि क्या पता उस झूठी, धोखे वाली दोस्ती से अच्छी दोस्ती अच्छा या अच्छी इंसान के लायक हो अच्छी दोस्ती के लायक हो| 
अगर आप सही हो तो वह से अलग हटकर अपने फ्यूचर में ध्यान दीजिये| कुछ ऐसा करिये जिससे आपको इन सब चीजों को लेकर मन में कोई भी गिला शिकवा न हो| अगर आपके साथ किसी ने कुछ गलत किया होगा या झूठ बोला होगा तो एक न एक दिन उस इंसान को इस बात का पछतावा ज़रूर होगा कि उसने अपनी एक अच्छी दोस्त, दोस्ती गवां दी| 
तो आज से अच्छी संगति को अपनाएं| लोगों को पहचानना सीखिए और आपके लिए क्या सही है| क्या गलत है| उन सभी चीजों पर गौर फरमाइए और आगे बढिये| 
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