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गांधी परिवार की एसपीजी सुरक्षा हटाना बीजेपी की औछी राजनीति – तरुण तेवतिया

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फरीदाबाद । गांधी परिवार की एसपीजी सुरक्षा हटाने के विरोध में कांग्रेसियों ने पृथला क्षेत्र के गांव सिकरी स्थित कार्यालय पर विरोध प्रदर्शन किया। युवा कांग्रेस के जिला अध्यक्ष तरुण तेवतिया के नेतृत्व में किए गए इस प्रदर्शन के दौरान क्षेत्र के पूर्व विधायक रघुबीर सिंह तेवतिया व युवा कांग्रेस के पृथला विधानसभा अध्यक्ष वरुण तेवतिया मुख्य रुप से मौजूद थे। मौके पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और गांधी परिवार को वापस एसपीजी सुरक्षा देने की मांग की। प्रदर्शन के दौरान तरुण तेवतिया ने कहा कि सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी व पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की एसपीजी सुरक्षा हटा कर बीजेपी ने औछी राजनीति का परिचय दिया है। देश के प्रमुख राजनेताओं की सुरक्षा की जिम्मेवारी सरकार की होती है। मनमोहन सिंह 10 साल तक देश के प्रधानमंत्री रहे हैं। वहीं, सोनिया गांधी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की बहु और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पत्नी हैं। हमें नहीं भूलना चाहिए कि दोनों पूर्व प्रधानमंत्रियों की हत्या की गई थी। सरकार पर गांधी परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है। अब सरकार ने गांधी परिवार की एसपीजी सुरक्षा हटा कर उन्हें जेड प्लस सुरक्षा दी गई है, जो ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार गांधी परिवार की सुरक्षा को लेकर गंभीर नहीं है। जिस परिवार के दो सदस्यों ने देश सेवा में शहादत को प्राप्त किया, उस परिवार की सुरक्षा से खिलवाड़ कर बीजेपी सरकार ने अपनी छोटी सोच का प्रमाण दिया है। उन्होंने इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या का जिक्र करते हुए कहा कि खतरों को देखते हुए चारों नेताओं की एसपीजी सुरक्षा बहाल की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार को इस संबंध में अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए और उसे दलगत भावना से उठकर काम करना चाहिए।

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नगरिकता विधेयक पारित होना ऐतिहासिक

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Passing the Citizenship Bill is historic

फरीदाबाद। नागरिकता विधेयक का संसद के दोनों सदन से पारित होना एक ऐतिहासिक घटना है। इस विधेयक द्वारा नागरिकता कानून, 1955 में संशोधन किया गया है ताकि पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धर्मों के लोगों को आसानी से भारत की नागरिकता मिल सके। किसी व्यक्ति को भारत की नागरिकता हासिल करने के लिए कम से कम पिछले 11 साल यहां रहना अनिवार्य है। इस नियम को आसान बनाकर इन लोगों के लिए नागरिकता हासिल करने की अवधि को एक साल से लेकर 5 साल कर दिया गया है। यानी इन तीनों देशों के छह धर्मों के बीते एक से छह सालों में भारत आकर बसे लोगों को नागरिकता मिल सकेगी। नागरिकता कानून, 1955 के मुताबिक अवैध प्रवासियों को भारत की नागरिकता नहीं मिल सकती थी। उन लोगों को अवैध प्रवासी माना गया है जो वैध यात्रा दस्तावेज जैसे पासपोर्ट और वीजा के बगैर आए हों या वैध दस्तावेज के साथ तो आए लेकिन अवधि से ज्यादा समय तक रुक जाएं। अवैध प्रवासियों को या तो जेल में रखा जा सकता है या विदेशी अधिनियम, 1946 और पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920 के तहत वापस उनके देश भेजा जा सकता है। नरेन्द्र मोदी सरकार ने साल 2015 और 2016 में 1946 और 1920 के इन कानूनों में संशोधन करके अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई को छूट दे दी है। आज ये वैध दस्तावेजों के बगैर भी रह रहे हैं और उनको नागरिकता के लिए अब किसी दस्तावेज की आवश्यकता नहीं है। विरोध नहीं होता तो नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 में ही पारित हो जाता। 8 जनवरी, 2019 को विधेयक को लोकसभा में पास कर दिया गया लेकिन राज्यसभा में पारित हो नहीं सकता था। राजनीतिक पक्ष-विपक्ष से अलग होकर विचार करें तो इस विधेयक को विभाजन के समय आए शरणार्थियों की निरंतरता के रुप देखे जाने की जरुरत थी। किंतु राजनीति जो न करे। कई प्रकार की गलतफहमी पैदा करने की कोशिश हुई। विरोध का एक बड़ा मुद्दा है, इसमें मुस्लिम समुदाय को अलग रखना। पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश तीनों इस्लामिक गणराज्य यानी मजहबी देश हैं। पाकिस्तान में शिया, सुन्नी, अहमदिया की समस्या इस्लाम के अंदर का संघर्ष है। वस्तुतः वहां उत्पीड़न दूसरे धर्म के लोगों का है। दूसरे, मुसलमान को भारत की नागरिकता का निषेध नहीं है। कोई भी भारत की नागरिकता कानून के तहत आवेदन कर सकता है और अर्हता पूरी होने पर नागरिकता मिल सकती है। जैसा गृह मंत्री अमीत शाह ने बताया पिछले पांच वर्ष में इन देशों के 566 से ज्यादा मुसलमानों के नागरिकता दी भी गई है। यह तर्क भी हास्यास्पद है कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है, जो समानता के अधिकार की बात करता है। इसमें कौन सी समानता का उल्लंघन है? तब तो इसके पहले जहां से जहां से लोग आए और नागरिकता दी गई वो सब असंवैधानिक हो जाएगा। अनुच्छेद 14 उचित वर्गीकरण की बात करता है और किसी एक समुदाय को नागरिकता दी जाती तो शायद इसका उल्लंघन होता। चौथे, यह कहा जा रहा है कि इससे भारत पर भार बढ़ेगा और नागरिकता के लिए बाढ़ आ जाएगी। निस्संदेह, इस कानून के बाद उत्पीड़ित वर्ग भारत आना चाहेंगे। पर इस समय तो ये भारत में वर्षों से रह रहे हैं। अलग से भार बढ़ने की समस्या नहीं है। इसे लेकर सबसे ज्यादा विरोध पूर्वोत्तर में दिखाई पड़ रहा है। हालांकि सिक्किम को छोड़कर सभी सांसदों ने विधेयक के पक्ष में मतदान किया। क्यों? क्योंकि उनकी ज्यादातर आशंकाओं को निराकरण किया है। पूर्वाेत्तर क्षेत्र में यह आशंका पैदा करने की कोशिश हो रही है कि अगर नागरिकता संशोधन लागू हो गया तो तो पूर्वोत्तर के मूल लोगों के सामने पहचान और आजीविका का संकट पैदा हो जाएगा। यह व्यवस्था पूरे देश के लिए बनी है केवल पूर्वोत्तर के लिए नहीं। अमित शाह द्वारा मणिपुर को इनरलाइन परमिट (आईएलपी) के तहत लाने की घोषणा के बाद पूर्वाेत्तर के तीन राज्य अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और मणिपुर पूरी तरह से नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 के दायरे से बाहर हो गए। शेष तीन राज्य- नागालैंड (दीमापुर को छोड़कर जहां आईएलपी लागू नहीं है), मेघालय (शिलॉन्ग को छोड़कर) और त्रिपुरा (गैर आदिवासी इलाकों को छोड़कर जो संविधान की छठी अनुसूची में शामिल नहीं हैं) को प्रावधानों से छूट मिली है। असम को लें तो छठी अनुसूची के तहत आने वाले तीन आदिवासी इलाकों (बीटीसी, कर्बी-अंगलोंग और दीमा हसाओ) के अलावा यह असम के सभी हिस्सों पर लागू होगा। इन आदिवासी इलाकों पर स्वायत्त जिला परिषदों का शासन है। तो स्थानीय संस्कृति, परंपरा तथा स्थानीय निवासियों के अधिकारों पर अतिक्रमण की आशंकाओं को खत्म करने के ठोस प्रावधान हैं। असम में इस कानून से केवल दो लाख लोगों को लाभ होगा। गृहमंत्री ने स्पष्ट कहा है कि जो इलाके बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन, 1873 के तहत आते हैं उन्हें घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि विधेयक वहां लागू नहीं होगा। यह विधेयक अचानक नहीं लाया गया। जैसे हमने उपर याद दिलाया कि पिछली सरकार में भी इसे पारित कराने की कोशिश हुई थी। 2019 के आम चुनाव के घोषणा पत्र में भाजपा ने नागरिकता कानून बनाने का वायदा किया था। वैसे सरकार के कदमों पर ध्यान दें तो वह लगातार इस दिशा में आगे बढ़ रही थी। सरकार ने उन्हें अनेक वैसी सुविधाएं दी जाने की घोषणा कर दी थी जो नागरिकों को प्राप्त है। पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान से आने वाले अल्पसंख्यकों को कुछ शर्तों के साथ संपत्ति खरीदने, पैन व आधार कार्ड बनवाने और बैंक खाता खुलवाने की अनुमति मिली। यही नहीं उन्हें राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में कहीं भी आने जाने की छूट मिल गई। जैसा हम जानते हैं पाकिस्तान से आने वालों पर आम पाकिस्तानी नागरिकों की तरह एक ही जगह रहने की बाध्यता है। नरेन्द्र मोदी सरकार ने सितंबर 2015 में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के हिंदू-सिख शरणार्थियों को वीजा अवधि खत्म होने के बाद भी भारत में रुकने की अनुमति दी थी। ये सुविधा उन लोगों को दी गई थी जो 31 दिसंबर 2014 को या इससे पहले भारत आ चुके थे। इस तरह एक क्रमबद्ध प्रक्रिया चल रही थी। वसतुतः इसे सांप्रदायिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। वहां हिन्दुओं, सिखों, बौद्धों, जैनों, पारसियों एवं विभाजन पूर्व भारत का नागरिक रह चुके ईसाइयों पर जुल्म होगा तो वे अपनी रक्षा और शरण के लिए किस देश की ओर देखेंगे? विभाजन के बाद वे वहां रह गए या गए तो उसके पीछे कई कारण रहे होंगे। धार्मिक कट्टरता के कारण उनके लिए अपनी धर्म-संस्कृति एवं परंपराओं का पालन करते हुए रहना संभव हीं रहा। या तो वे मुसलमान बन जाएं या फिर उनके साथ तरह-तरह की यातनायें। वास्तव में 1947 में शरणार्थी के रुप में पाकिस्तान से आने वाले हिन्दुओं एवं सिख्खों को जिस तरह स्वाभाविक नागरिकता मिल गई उसी व्यवस्था को आगे बढ़ाते हुए इनको भी स्वीकार किया जाना चाहिए था। विभाजन के समय अल्पसंख्यकों की संख्या पाकिस्तान में 22 प्रतिशत के आसपास थी जो आज तीन प्रतिशत है। बांग्लादेश की 23 प्रतिशत आबादी 8 प्रतिशत से कम रह गई है। कहां गए वे? या तो मुसलमान बना दिए गए, मार दिए गए या फिर भाग गए। वहां जिस तरह के अत्याचार अल्पसंख्यकों पर होने आरंभ हुए वे अकल्पनीय थे। इससे अनुसूचित जाति के अनेक नेताओं, जिनने मुस्लिम लीग के साथ दोस्तीगांठकर पाकिस्तान का रुख किया था को आठ-आठ आंसू बहाना पड़ा। जब उनके धार्मिक उत्पीड़न की खबर आने लगी तो गांधी जी ने 4 नवंबर 1947 को बयान दिया कि सभी हरिजनों को भारत ले आओ। 1950 में प. जवाहर लाल नेहरु और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के बीच दिल्ली समझौता हुआ जिसमें दोनों देशों ने अपने यहां अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, उनका धर्म परिवर्तरन नहीं करने से लेकर सभी प्रकार का नागरिक अधिकार देने का वचन दिया। इस समझौते के बाद पाकिस्तान के अल्पसंख्यक वहां के प्रशासन की दया पर निर्भर हो गए। धार्मिक भेदभाव और जुल्म की इंतिहा हो गई। शत्रु संपत्ति कानून का दुरुपयोग करते हुए संपत्तियों पर जबरन कब्जा सामान्य बात हो गई और इसके खिलाफ शिकायत के लिए कोई जगह नहीं। अत्याचार, संपत्ति लूटने, महिलाओं की आबरु लूटने, धर्म परिवर्तन कर निकाह करने की खबरे आतीं रहीं, लेकिन भारत ने कभी प्रभावी हस्तक्षेप करने का साहस नहीं दिखाया जो उसकी जिम्मेवारी थी। पूर्वी पाकिस्तान में वर्तमान पाकिस्तान की सेना ने जिन हजारों महिलाओं के साथ बलात्कार किया, उनकी निर्ममता से हत्याएं कीं उनमें हिन्दुओं की ही संख्या ज्यादा थीं। अफगानिस्तान में कट्टरपंथी तालिबानी शासन और उसके बाद संघर्ष में धार्मिक उत्पीड़न के कारण उनकी भी चिंता की गई है। सच कहा जाए तो उनको नागरिकता देकर भारत अपने पूर्व के अपराधों का परिमार्जन करेगा जिनके कारण कई करोड़ या तो धर्म परिवर्तन की त्रासदी झेलने को विवश हो गए या फिर भारत की मदद की आस में उत्पीड़न- अत्याचार सहते चल बसे। इस कानून के द्वारा एक इतिहास के एक नए अध्याय का निर्माण हुआ है जिसमें आने वाले समय में कई ऐसे पन्ने जुड़ेंगे जो अनेक परिवर्तनों के वाहक बनेंगे।

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क्यों विवाद बनाये रखना चाहते हैं कुछ लोग

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Rethinking petition decided unfortunate

अवधेश कुमार सुन्नी वक्फ बोर्ड द्वारा अयोध्या मामले पर आगे न बढ़ने के निर्णय के बावजूद औल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड पुनर्विचार याचिका डलवाएगा। जमीयत उलेमा हिंद का एक गुट भी न्यायालय जा रहा है। वस्तुतजः अयोध्या मामले पर उच्चतम न्यायालय के फैसले से देश के बहुमत ने यह सोचते हुए राहत की सांस ली कि 491 वर्ष के विवाद का बेहतरीन हल निकल आया है। किंतु कुछ ही मिनट बाद बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक जफरयाब जिलानी यह कहते हुए सामने आ गए कि हम फैसले से संतुष्ट नहीं हैं, यह विरोधाभासी है….और इसके विरुद्ध पुनर्विचार याचिका दायर करेंगे। इसके बाद असदुद्दीन ओवैसी यह कहते हुए सामने आए कि हमारे साथ इंसाफ नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम है लेकिन इनफौलिबल नहीं है यानी ऐसा नहीं है जो गलती नहीं कर सके। उसके बाद उन्होंने उच्चतम न्यायालय पर जिस तरह की टिप्पणियां कीं और अभी भी कर रहे हैं वो सब देश के सामने है। ये वो लोग हैं जो फैसले के पहले तेज आवाज मंे यह कहते थे कि हम तो उच्चतम न्यायालय का फैसला मानेंगे लेकिन दूसरे पक्ष मानेंगे कि नहीं उनसे पूछिए। वास्तव में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने पुनर्विचार याचिका डालने का जो फैसला किया वह दुर्भाग्यपूर्ण, दुखदायी और क्षोभ पैदा करने वाला तो है लेकिन इसमें आश्चर्य का कोई पहलू नहीं है। फैसले के साथ ही यह साफ दिखने लगा था कि कुछ मुस्लिम चेहरे जिनका वजूद ही अयोध्या विवाद पर टिका है और जो देश में स्वयं को एकमात्र मुसलमानों का नेता बनने का ख्वाब पाल रहे हैं वे इस मुद्दे को यूं ही हाथ से जाने नहीं देंगे। वास्तव में फैसले के बाद आम मुसलमानों की प्रतिक्रिया यही थी कि अब इस मामले को यही समाप्त किया जाए। लेकिन इसके विरूद्ध ये लोग सक्रिए हो गए। जब याचिकाकर्ता कहने लगे कि हम अपील नहीं करेंगे तो उन पर प्रत्यक्ष-परोक्ष दबाव बनाने की पूरी कोशिश हुई और आज अगर मुस्लिम पर्सनल लौ बोर्ड के चार पक्षकार अपील के लिए तैयार हैं तो इसके पीछे निहित स्वार्थी तत्वों का दबाव ही है। जिलानी ने तो यहां तक कह दिया था कि अगर याचिकाकर्ताओं में से कोई नहीं जाएगा तब भी मुस्लिम समाज से कोई याचिका डाल सकता है क्योंकि यह पूरे समुदाय का मसला है। तो जो इस सीमा तक तैयार हैं वे पुनर्विचार याचिका नहीं डालेंगे ऐसा मानने का कोई कारण नहीं हैंं। जरा सोचिए अगर बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी अस्तित्व में नहीं आता तो जफरयाब जिलानी को कौन जानता? यही बात अनेक के साथ लागू होता है। पुनर्विचार याचिका में जाना हर वादी-प्रतिवादी का हक है। किंतु यह आम या दो-चार व्यक्तियांे के बीच का मामला नहीं है। इससे भारत के अंदर और बाहर रहने वाले करोड़ों हिन्दुओं की भावनायें जुड़ी हैं, जबकि बाबरी का महत्व इस्लाम मंे कुछ भी नहीं है। फिर ये जिन तर्को के साथ पुनर्विचार के लिए जा रहे हैं उन सबका उच्चतम न्यायालय पहले ही जवाब दे चुका है। इन्होंने दस तर्क दिए हैं। एक, उच्चतम न्यायालय ने माना है कि बाबर के सेनापति मीरबाकी की ओर से मस्जिद का निर्माण कराया गया था। दो, 1857 से 1949 तक बाबरी मस्जिद की तीन गुंबदों वाली इमारत और अंदरुनी हिस्सा मुस्लिमों के कब्जे में माना गया है। तीन, न्यायालय ने माना है कि बाबरी मस्जिद में आखिरी नमाज 16 दिसंबर, 1949 को पढ़ी गई थी यानी वह मस्जिद के रूप में थी। चार, न्यायालय ने माना है कि 22-23 दिसंबर, 1949 की रात को चोरी से या फिर जबरदस्ती मूर्तियां रखी गई थीं। पांच, गुंबद के नीचे कथित रामजन्मभूमि पर पूजा की बात नहीं कही गई है। ऐसे में यह जमीन फिर रामलला विराजमान के पक्ष में क्यों दी गई? छः, न्यायालय ने खुद अपने फैसले में कहा है कि रामजन्मभूमि को पक्षकार नहीं माना जा सकता। फिर उसके आधार पर ही फैसला क्यों दिया गया? सात, न्यायालय ने माना है कि 6 दिसंबर, 1992 में मस्जिद को गिराया जाना गलत था तो मंदिर के लिए फैसला क्यों दिया गया। आठ, न्यायालय ने कहा कि हिंदू सैकड़ों साल से पूजा करते रहे हैं, इसलिए जमीन रामलला को दी जाती है, जबकि मुस्लिम भी तो वहां इबादत करते रहे हैं। नौ, जमीन हिंदुओं को दी गई है इसलिए 5 एकड़ जमीन दूसरे पक्ष को दी जाती है। न्यायालय ने संविधान के 142 का इस्तेमाल कर यह बात कही। इसमें वक्फ ऐक्ट का ध्यान नहीं रखा गया, उसके मुताबिक मस्जिद की जमीन कभी बदली नहीं जा सकती है। एवं दस, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आधार पर ही न्यायालय ने यह माना कि किसी मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण नहीं हुआ था। सच यह है कि इन दसों प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय के 40 दिनों की बहस में दोनों पक्षों ने अपने- अपने तर्क और तथ्य दिए थे। फैसले में इन सबका जवाब दिया गया है। सबसे अंतिम तर्क मस्जिद के लिए जमीन के प्रश्न को लीजिए। न्यायालय ने इसे क्षतिपूर्ति नहीं कहा है। केवल इतना कहा है कि न्यायालय अगर मुस्लिमों के हक को नजरअंदाज करती है तो न्याय नहीं होगा। संविधान हर धर्म को बराबरी का हक देता है और सहिष्णुता तथा परस्पर शांतिपूर्ण सह अस्तित्व हमारे देश और यहां के लोगों की सेक्यूलर प्रतिबद्धता को मजबूत करते हैं। इसने कहा कि आवंटित भूमि का क्षेत्र तय करते हुए यह आवश्यक है कि मुस्लिम समुदाय को भूमि दी जाए। न्यायालय ने माना ही नहीं है कि वहां मूल रुप से मस्जिद था।ं पीठ ने कहा है कि अधिसंभाव्यता की प्रबलता के आधार पर अंदर पाई गई संरचना की प्रकृति इसके हिंदू धार्मिक मूल का होने का संकेत देती है जो 12 वीं सदी की है। निस्संदेह, संविधान पीठ ने कहा है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यह नहीं बता पाया कि मंदिर गिराकर मस्जिद बनाई गई थी। लेकिन न्यायालय ने सुन्नी वक्फ बोर्ड और अन्य मुस्लिम पक्षकारों द्वारा सर्वेक्षण की रिपोर्ट खारिज किए जाने के सारे तर्क अमान्य करार दिए। कहा कि पुरातात्विक प्रमाणों को महज एक ओपिनियन करार दे देना भारतीय पुरातत्व सवेक्षण का अपमान होगा। पुरातत्व सर्वेक्षण की खुदाई से पता चला कि विवादित मस्जिद पहले से मौजूद किसी संरचना पर बनी है। ढहाए गए ढांचे के नीचे एक मंदिर था, इस तथ्य की पुष्टि पुरातत्व सर्वेक्षण करती है। खुदाई ने पहले से मौजूद 12वीं सदी की संरचना की मौजूदगी की पुष्टि की है। संरचना विशाल है और उसके 17 कतारांे में बने 85 खंभों से इसकी पुष्टि भी होती है। नीचे बनी हुई वह संरचना जिसने मस्जिद के लिए नींव मुहैया करायी, स्पष्ट है कि वह हिन्दू धार्मिक मूल का ढांचा था। इसमें यह कहना कि जब उसने तोड़कर बनाने के प्रमाण दिए ही नहीं उसके आधार पर फैसला कैसे दे दिया गया बिल्कुल हास्यास्पद है। मौजूदा न्याय प्रणाली को जिस तरह के प्रत्यक्ष साक्ष्य की आवश्यकता होती है उसकी बात न्यायालय ने कही है। कोई स्वर्ग से उतरकर बताने तो आएगा नहीं कि मेरे सामने मंदिर तोड़ी जा रही थी। आगे बढ़िए तो न्यायालय ने साफ कहा है कि सुन्नी वक्फ बोर्ड यह साबित नहीं कर पाया कि विवादित जगह पर उसका बिना किसी बाधा के लंबे समय तक कब्जा रहा। व्यवधान के बावजूद साक्ष्य यह बताते हैं कि प्रार्थना पूरी तरह से कभी बंद नहीं हुई। मुस्लिमों ने ऐसा कोई साक्ष्य पेश नहीं किया, जो यह दर्शाता हो कि वे 1857 से पहले मस्जिद पर पूरा अधिकार रखते थे। इस बात के पूरे सबूत हैं कि राम चबूतरा और सीता रसोई पर हिंदू 1857 से पहले भी पूजा करते थे। मीर बाकी ने बाबरी मस्जिद का निर्माण 1528 में कराया था लेकिन यह स्थल दशकों से निरंतर संघर्ष का केन्द्र रहा। पीठ ने कहा कि 1856-57 में सांप्रदायिक दंगा भड़कने से पहले हिंदुओं को परिसर में पूजा करने से नहीं रोका गया। 1856-57 के दंगों के बाद पूजा स्थल पर रेलिंग लगाकर इसे बांट दिया गया ताकि दोनों समुदायों के लोग पूजा कर सकें। 1934 में हुए दंगे इशारा करते हैं कि बाद में अंदर के आंगन का मसला गंभीर तकरार का मुद्दा बन गया। इसके स्पष्ट साक्ष्य हैं कि हिंदू विवादित ढांचे के बाहरी हिस्से में पूजा करते थे। कानून-व्यवस्था और शांति बनाए रखने के लिए, ब्रिटिश सरकार ने परिसर को भीतरी और बाहरी बरामदे में विभाजित करते हुए छह से सात फुट ऊंची ग्रिल-ईंट की दीवार खड़ी की। भीतरी बरामदे का इस्तेमाल मुसलमान नमाज पढ़ने के लिए और बाहरी बरामदे का इस्तेमाल हिंदू पूजा के लिए करने लगे। इसे देखने के बाद बोर्ड का कौन सा प्रश्न अनुत्तरित है जिसके लिए ये पुनर्विचार याचिका लेकर जा रहे है? न्यायालय ने हर उस पहलू की जांच की है जो इससे जुड़े हैं। श्रीरामलला विराजमान के बारे में न्यायालय ने कहा कि 1989 में भगवान श्रीराम लला विराजमान की ओर से दायर याचिका बेवक्त नहीं थी। अयोध्या में विवादित मस्जिद की मौजूदगी के बावजूद उनकी पूजा-सेवा जारी रही। फैसले में रामजन्मभूमि के पक्ष में ऐसे-ऐसे साक्ष्य और तर्क हैं जिनको किसी सूरत में खारिज नहीं किया जा सकता। इन सबको यहां प्रस्तुत करना संभव नहीं। जानबूझकर ये खत्म हो चुके विवाद को बनाए रखना चाहते हैं। प्रश्न है क्यों? इससे तो सांप्रदायिक तनाव बढ़ेगा। आवश्यक है कि विवेकशील मुस्लिम निहित स्वार्थी नेताओं की मुखालफत करें। मुस्लिम समाज की ओर से मुखर विरोध ही इनका बेहतर जवाब हो सकता है।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208

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किसानों की कर्ज माफी समाधान से ज्यादा समस्या

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Awadhesh kumar

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इसका उत्तर देने के लिए कई पहलुओं पर गंभीरता से विचार करना होगा। पार्टियां और सरकारें सभी किसानों के कर्ज माफी की घोषणा करती हैं, पर सारे किसान इसके दायरे में नहीं आते, न ही सारे कर्ज। उदाहरण के लिए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि 30 नवंबर 2018 की स्थिति के अनुसार सहकारी बैंक व छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंक में कृषकों के अल्पकालीन ऋण को माफ कर दिया गया। इन दो श्रेणियों के बैंकों से जिन किसानों ने अल्पकालिक कर्ज लिया होगा उनका ही बोझ उतरेगा। अधिसूचित वाणिज्यिक बैंकों के अल्पकालीन कृषि ऋण के परीक्षण के बाद कृषि कर्ज को माफ करने की कार्रवाई की जाएगी। राजस्थान में गहलोत के शब्दों में किसानों का सहकारी बैंकों का सारा कर्ज माफ किया जाएगा तथा वाणिज्यिक, राष्ट्रीयकृत व ग्रामीण बैंकों में कर्जमाफी की सीमा दो लाख रुपये रहेगी। गणना के लिए 31 नवंबर 2018 की समयसीमा तय की गई है। इससे खजाने पर करीब 18000 करोड़ रुपये का बोझ आएगा। मध्यप्रदेश में घोषणा हो गई लेकिन राज्य स्तर से लेकर जिला स्तर तक गठित समितियों की रिपोर्ट के आधार पर पात्रता और मापदंड तय होंगे और उसके बाद कर्ज माफी प्रमाण पत्र वितिरत किए जाएंगे। कहने का तात्पर्य यह कि चुनावी वायदा करने के बाद यथार्थ का सामना करना पड़ता है और माफी की राजनीतिक घोषणा के बावजूद इसका क्रियान्वयन वैसे ही नहीं होता जैसी कल्पना की जाती है। इसके रास्ते अनेक समस्यायें सामने आतीं हैं। इनमें प्रदेश की माली हालत सर्वप्रमुख है।

अगर राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा हुआ तो स्थिति कितनी विकट होगी इसकी कल्पना करिए। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए 1 सरकार ने 2008 में 3.73 करोड़ किसानों के 52,260 करोड़ रुपया कर्ज माफ किया था। वित्तीय स्थिति पर उतनी राशि का भी असर पड़ा। आज की स्थिति क्या है? वित्त मंत्रालय की तरफ से 17 दिसंबर को संसद में बताया गया कि वर्ष 2017-18 में 7.53 लाख करोड़ रुपये का फसल कर्ज दिया गया। वर्तमान वित्त वर्ष का आंकड़ा नहीं आया है, लेकिन यह 9 लाख करोड़ रुपये के आसपास है। हमारा कुल बजट 24 लाख करोड़ रुपये का है। अगर यह पूरी राशि माफ कर दी जाए तो राजकोषीय घाटा कुछ समय के लिए सीधे 7 प्रतिशत के आसपास पहुंच जाएगा। यह किसी भी खजाने के लिए खतरे की घंटी होती है। केवल छोटे और सीमांत किसानों का माफ किया गया तो क्या होगा? किसान कर्ज में सीमांत व छोटे किसानों की हिस्सेदारी लगभग 80 प्रतिशत होती है, लेकिन संस्थागत कर्ज में उनकी हिस्सेदारी 60 प्रतिशत है। इसके अनुसार भी हिंसाब लगाये तो 5 लाख करोड़ से ज्यादा की राशि चाहिए। यह देश के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग तीन प्रतिशत है। यही राजकोषीय स्थिति को चरमरा देगा। कहने की आवश्यकता यह कि राजनीतिक लोकप्रियतावाद का यह अतार्किक होड़ आत्मघाती है। एक राज्य में कर्ज माफी के वादे का असर देश भर में पड़ता है और लोग कर्ज वापस करना बंद कर देते हैं। कांग्रेस की घोषणा के बाद बैंकों ने वित्त मंत्रालय के समक्ष यह बात उठाई थी कि छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान से किसानों से कर्ज वसूलना मुश्किल हो गया है। लोग सोचते हैं कि माफ होना ही है तो कर्ज वापस करने की आवश्यकता क्या है। यूपीए सरकार द्वारा वर्ष 2008 में कर्ज माफी के बाद दो वर्षों तक कृषि कर्जों की वसूली कठिन हो गई थी। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों को देखें तो वर्ष 2012 में कृषि क्षेत्र में फंसे कर्जे यानी एनपीए की राशि 24,800 करोड़ रुपये थी जो 2017 में बढ़ कर 60,200 करोड़ रुपये हो गई। आगे भी ऐसे ही होने का खतरा बढ़ गया है। कृषि का नाम पर लिए गए कर्ज के अधिकांश भाग का एनपीए बनना तय है।

निस्संदेह, वास्तविक किसानों की दशा बुरी है और उनकी पीठ पर हाथ रखने की आवश्यकता है। किंतु कर्ज माफी समाधान नहीं समस्या है। ग्रामीण कर्ज पर हुए अध्ययनों से पता चलता है कि छोटे और सीमांत किसानों पर कर्ज का बोझ काफी है लेकिन उनमें से ज्यादा गैर बैंकिंग स्रोतों से लिया गया है। छोटा किसान बैंक के दरवाजे पर आज भी नहीं जाता है। वे आसपास के लोगों से कर्ज लेते हैं। इनको माफी से लाभ नहीं। कर्ज माफी की अपसंस्कृति के कारण गांव-गांव में धूर्त लोग कृषि के नाम पर कर्ज लेकर लौटाने की नहीं सोचते। 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार द्वारा कर्ज माफी के बाद से यह चरित्र पैदा हुआ है। सरकारों के पास ऐसी कोई मशीनरी नहीं जो पता कर सके कि किन किसानों के पास गैर बैंकिंग कर्ज कितना है। यह भी पता नहीं किया जाता कि कृषि के नाम पर लिए गए कर्ज में कितने वाकई कृषि के लिए ही लिया गया। उनमें कितनों की दशा कृषि के कारण बुरी है और उनको माफी की आवश्यकता है। इस तरह इससे वास्तविक किसानों का अत्यंत कम लाभ मिलता है।

माफ करने के बाद सरकारों को बैंकों को राशि चुकानी होती है। जाहिर है, माफ की गई राशि की पूर्ति सरकारें करों से ही करती है। हम आप जो कर देंगे उनसे ही इसकी पूर्ति की जाएगी। तो भार हमारे-आपके सिर ही आना है। अगर इससे वास्तविक किसानों का वास्तविक भला होता तो एक बार भार झेल लेने में समस्या नहीं थी। किंतु कर्जमाफी से किसानों की दशा सुधरी हो इसके कोई प्रमाण नहीं है। इसकी जगह किसानों की दशा सुधारने के लिए कृषि से संबंधित मूलभूत संरचना और संसाधन विकसित हों। कृषि सम्मान का पेशा बने, उसकी लागत कम हो, बीज, उर्वरक और सिंचाई तो उचित मूल्य पर उपलब्ध हो ही फसलों का उचित मूल्य भी मिले, कृषि बीमा योजना व्यवाहारिक रुप से लागू हो, आम आवश्यकता की सेवाएं यानी स्वास्थ्य, शिक्षा आदि तथा वस्तुएं उनको उचित मूल्य पर उपलब्ध हों……इन सबकी व्यवस्था हो। कर्ज माफी की राशि इन पर खर्च हो तो उसका स्थायी लाभ मिलेगा। सबसे बड़ी समस्या कृषि श्रमिकों की अनुपलब्धता है। यह बहुत बड़ा खर्च भी है। यदि मनरेगा को खेती से संबद्ध कर दिया जाए तो लघु और सीमांत किसानों का श्रमिकों का संकट दूर होगा और बहुत बड़ी राशि बचेगी।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर,

पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः 110092

दूरभाषः 01122483408, 9811027208

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