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सीबीआई को पेशेवर संस्था बनाने की जरुरत

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Awadhesh kumar

whitemirchi.com

सीबीआई का नाम सुनते ही जेहन में एक ऐसी संस्था का नाम उभरता है जिसके पास मामला जाते ही हर आरोपी कांप जाता है। वो कितना भी बड़ा शख्स क्यों न हो सीबीआई की जांच से बचना चाहता है। किंतु ऐसे कई प्रसंग आए हैं जिससे सीबीआई की एक निष्पक्ष पेशेवर जांच एजेंसी की छवि पर ग्रहण लगा है। इस समय इसके दो शीर्षतम अधिकारियों निदेशक एवं विशेष निदेशक के बीच जो संघर्ष सामने आया वह वाकई विचलित करने वाला है। विशेष निदेशक के खिलाफ निदेशक के निर्देश पर एक मामले में घूसखोरी के आरोप में प्राथमिकी दर्ज होना केन्द्रीय जांच एजेंसी के इतिहास का पहला ऐसा वाकया है जिसके बारे में किसी ने कल्पना तक नहीं की होगी। यह मामला आगे क्या मोड़ लेगा अभी इस बारे में कुछ कहना कठिन है। केन्द्र ने कड़ा कदम उठाते हुए दोनों अधिकारियों को तत्काल छुट्टी पर भेज दिया है तथा भारी पैमाने पर तबादला एवं पोस्टिंग की गई है।

इस समय सीबीआई के कार्य को सुचारू रूप से चलाने के लिए यह जरूरी था। किंतु इस कुरुप प्रकरण ने कई ऐसी दुरावस्थाओं की पुष्टि की है जो त्वरित निदान की मांग करता है। एक, सीबीआई भी घूसखोरी एवं अन्य प्रकार के भ्रष्टाचार से अछूती नहीं है। दो, किसी मामले में वैसे व्यक्ति को भी नोटिस और पूछताछ से परेशान किया जा सकता है जिसका सीधा उससे कोई लेना-देना नहीं हो। इसका उद्देश्य क्या हो सकता है बताने की आवश्यकता नहीं। तीसरे, घूसखोरी के लिए बिचौलियों का सहारा भी लिया जाता है। चार, एजेंसी के अंदर शीर्ष अधिकारियों के बीच सत्ता संघर्ष या एक दूसरे को टांग खींचने से लेकर फंसाने तक के अपराध घटित होते हैं। पांच, शीर्ष अधिकारी की मनमानी से कोई मामला लंबे समय तक किसी न किसी प्रकार की प्रक्रियागत खांच का हवाला देकर लटकाया जा सकता है। और छः, निर्धारित नियमों के होते हुए भी निदेशक चाहें तो किसी अधिकारी को किसी प्रमुख विभाग में प्रतिनियुक्त कर सकते हैं।
सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा बनाम विशेष निदेशक राकेश अस्थना प्रकरण में आपको ये सारी बातें सामने आ चुकीं हैं। आखिर जो उपाधीक्षक देवेन्द्र कुमार मामले को गलत मोड़ देने तथा घूस लेने के आरोप में गिरफ्तार हुआ है वह बहुचर्चित मोईन अख्तर कुरैशी मामले का जांच अधिकारी था।

सतीश बाबू साना इसमें दोषी हो या नहीं किंतु उसे बार-बार नोटिस भेजकर परेशान करने के पीछे एक सीधा उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा रकम ऐंठना नजर आता है। इसके लिए बिचौलिये के रुप में दुबई में बैठा मनोज प्रसाद और सोमेश काम कर रहा था। पता नहीं ऐसे कितने मामले होंगे जिसमें इस तरह का शर्मनाक खेल चल रहा होगा। कितने लोग परेशान हो रहे होंगे। राकेश अस्थाना ने कैबिनेट सचिव एवं केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त को जो शिकायती पत्र दिया उसमें सतीश को गिरफ्तार करने की फाइल को अटकाने तथा लालू प्रसाद से संबंधित मामले को आगे न बड़ने देने सहित दागदार व्यक्ति को भ्रष्टाचार निरोधक शाखा में प्रतिनियुक्त करने का आरोप है। ऐसा तो हो नहीं सकता कि ये सब बातें सीबीआई में पहली बार हो रही होंगी। यूपीए सरकार के कार्यकाल में सीबीआई निदेशक रहे रंजीत कुमार पर भी इसी तरह के आरोप लगे थे। मामले के आरोपियों से अपने घर पर मुलाकात करने के प्रमाण मिलने के बाद निदेशक रहते हुए न्यायालय ने उन्हें जांच से बाहर कर दिया तथा आज भी उनके खिलाफ मामला चल रहा है। उस दौरान अधीक्षक स्तर से लेकर नीचे के तीन अधिकारियों को घूस लेने के आरोप में पकड़ा गया था।

आज सीबीआई की जांच का दायरा जितना विस्तृत हो गया है तथा नए-नए तरह के अपराध सामने आ रहे हैं उसमें भारत को एक शत-प्रतिशत ईमानदार, कुशल, सक्षम और पेशेवर कर्मियों से भरे हुए सीबीआई की आवश्यकता है। इसकी तुलना अमेरिका की संघीय जांच ब्यूरो या एफबीआई जैसी संस्था से की जाती है। ऐसा नहीं है कि सीबीआई ने अपनी कार्यकुशलता तथा ईमानदारी का परिचय नहीं दिया है। एक आंकड़ा बताता है कि सीबीआई और 67 प्रतिशत मामलों में आरोपियों को सजा दिलाने में सफल होती है। उसकी सफलताओं की फेहरिस्त भी लंबी है। पिछले ही वर्ष हरियाणा के रेयान विद्यालय में छात्र प्रद्युम्न की हत्या मामले में पुलिस ने बस के एक खलासी को फंसाकर अपनी ओर से छानबीन पूरी कर दी थी। सीबीआई के हाथ में आते ही पूरा मामला पलट गया एवं असली हत्यारा छात्र सामने आ गया। चारा घोटाले में लालू यादव सहित अनेक नेताओं-अधिकारियों को मिली सजा को भी इसकी फेहरिस्त  हम शामिल कर सकते हैं। किंतु इसके साथ अनेक मामलों में इसकी शर्मनाक विफलताओं की भी फेहरिस्त इतनी ही लंबी है। 2 जी मामले में सभी आरोपियों का बरी हो जाना इसकी विफलता ही तो है। बोफोर्स मामले में सीबीआई कुछ नहीं पा सकी। 1984 के दंगों के मामले में वह विफल है। व्यापमं घोटाले की जांच विशेष जांच दल से लेकर इसे दिया गया किंतु इसमे विशेष प्रगति नहीं है। 1990 के दशक का झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड में भी अंततः पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव सहित सभी आरोपी बरी हो गए। आरुशि हत्यांकांड भी सीबीआई की कुशलता पर आज भी प्रश्नों के हथौड़े मार रहा है।

अगर मौजूदा शर्मनाक प्रकरण के आलोक में ऐसे मामलों का विश्लेषण किया जाए तो जो पहला निष्कर्ष आएगा वही हमें अशांत कर देगा। क्या इन सारे मामलों में भी वही सब खेल हुआ जो आज हमारे सामने है? एक समय था जब सीबीआई की निष्पक्षता को लेकर कोई प्रश्न नहीं उठता था। इस एजेंसी की जड़ें ब्रिटिश काल में हैं। किंतु 1963 में जब इसे सीबीआई का नाम मिला तो इसकी भूमिका की प्रस्तावना नए सिरे से लिखी गई। उसकी चार्टर ऑफ ड्युटी फिर से निर्धारित हुई। संगठनात्मक संरचना बदली। लालबहादूर शास्त्री ने इसे एक निष्पक्ष एवं कुशल जांच एजेंसी बनाने की मानसिकता से काम किया और इसका असर लंबे समय तक रहा। किंतु बाद के काल में इसमें राजनीतिक नियुक्तियां होने लगीं। वस्तुतः सीबीआई पर एक बड़ा आरोप राजनीतिक हस्तक्षेप के अनुसार मामले को आगे बढ़ाने या लटकाने का लगता रहा है। इसमें सच्चाई भी है। सरकारों ने इस एजेंसी का मनमाना दुरुपयोग किया है। बोफोर्स मामला तो पूरी तरह राजनीतिक हस्तक्षेप का शिकार हो गया। 1992 में माधवसिंह सोलंकी विदेश मंत्री के रुप स्विट्जरलैंड यात्रा पर गए थे। उनके पॉकेट से एक पत्र गिर गया जिसमें स्विस सरकार से बोफोर्स मामले पर आगे न बढ़ने का निवेदन किया गया था। कोयला घोटाला का शपथ पत्र 2013 में बदला गया जिसमें सीबीआई निदेशक के साथ प्रधानमंत्री कार्यालय में तत्कालीन मंत्री अश्विनी कुमार एवं दो संयुक्त सचिवों की भूमिका सामने आई। अश्विनी कुमार को राजनीतिक हंगामे के बाद पद से हटना पड़ा। 9 मई 2013 को उच्चतम न्यायालय ने सबसे कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि सीबीआई पिंजड़े का तोता है जो अपने राजनीतिक आका की भाषा बोलता है जिसे आजाद करना जरुरी है।

सच कहा जाए तो राजनीतिक सोच से की गई नियुक्तियों तथा हस्तक्षेप ने सीबीआई की कार्यकुशलता को बुरी तरह प्रभावित किया है। इससे कोई सरकार वंचित नहीं है। राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ सीबीआई का दुरुपयोग हुआ है। माना जाता है कि मायावती और मुलायम सिंह यादव को आय से अधिक संपत्ति मामले में सीबीआई का भय दिखाकर यूपीए सरकार इनका समर्थन बनाए रखने में सफल रही थी। हालांकि इसकी जांच को मौनिटर करने के लिए केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त को संवैधानिक अधिकार देकर बिठाया गया। 2013 के कोयला घोटाला शपथपत्र प्रकरण के बाद उच्चतम न्यायालय ने सरकार को कई बदलाव करने पर मजबूर किया। इसमें निदेशक की नियुक्ति से सरकार का सम्पूर्ण एकाधिकार खत्म करने से लेकर, उसे अपने काम में ज्यादा स्वायत्तता तथा वित्तीय अधिकार वृद्धि शामिल है। उसके बाद यह उम्मीद थी कि सीबीआई ज्यादा स्वतंत्रता, निर्भीकता तथा निष्पक्षता से काम करेगी। वर्तमान प्रकरण इस बात का प्रमाण है कि ऐसा नहीं हो पाया है। हालांकि वर्तमान मामले में राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं दिखा है। राकेश अस्थाना गुजरात में नरेन्द्र मोदी के प्रिय अधिकारी रहे हैं। उनको सीबीआई में लाया गया था। यदि राजनीतिक हस्तक्षेप होता तो उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज नहीं होती। हां, शेष दोष और दुर्गुण सीबीआई के अंदर बने हुए हैं।

भ्रष्टाचार, अनियमितता तथा निर्णय में अधिकारसंपन्न पदधारियों द्वारा मनमाना निर्णय हमारे देश के लिए कैंसर सदृश हैं। पर जिस संस्था पर जांच कर दोषियों को सजा दिलवाने तथा भ्रष्टाचार उन्मूलन में सर्वप्रमुख भूमिका निभाने का दायित्व है वही अगर इन बीमारियों का शिकार है तो फिर देश के लिए इससे ज्यादा चिंता का कोई विषय नहीं हो सकता। साफ है कि वर्तमान प्रकरण को एक प्रस्थान बिन्दु मानकर सीबीआई को फिर से इसकी सही भूमिका में लाने के लिए नियुक्तियों-प्रतिनियुक्तियों से लेकर इसकी कार्यप्रणाली में व्यापक बदलाव का कदम उठाया जाना चाहिए।

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नगर निगम ने फरीदाबाद शहर को बना दिया कूड़े का ढेर – जसवंत पवार

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वैसे तो फरीदाबाद शहर को अब स्मार्ट सीटी का दर्जा प्राप्त हो चूका है, परन्तु शहर के सड़कों पर गंदगी के ढेर  फरीदाबाद प्रशासन और नगर को आइना दिखा रहे हैं

शहर के अलग अलग मुख्य चौराहों और सड़कों पर पढ़े कूड़े के ढेर को लेकर समाज सेवी जसवंत पवार ने फरीदाबाद प्रशासन और नगर निगम कमिश्नर से पूछा है कि एक तरफ भारत के प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी कहते हैं कि स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत मुहिम को पूरे देश में चला रहे हैं वही नगर निगम इस पर पानी फेरता दिख रहे हैं फरीदाबाद में आज सड़कों पर देखे तो गंदगी के ढेर लगे हुए हैं पूरे शहर को इन्होंने गंदगी का ढेर बना दिया है। जिसके चलते फरीदाबाद शहर अभी तक एक बार भी स्वछता सर्वेक्षण में अपनी कोई अहम् भूमिका अदा नहीं कर पा रहा,  अगर ऐसे ही चलता रहा तो हमारा फरीदाबाद शहर स्वच्छता सर्वे में फिर से फिसड्डी आएगा। साल 2021 में स्वछता सर्वेक्षण 1 मार्च से 28 मार्च तक किया जाना है जिसको लेकर लगता नहीं की जिला प्रसाशन व फरीदाबाद के नेता और मंत्री फरीदाबाद शहर की स्वछता को लेकर बिल्कुल भी चिंतित दिखाई नहीं पढ़ते है।

जसवन्त पंवार ने फरीदाबाद वासियों से अनुरोध और निवेदन किया है अगर हमें अपना शहर स्वच्छ और सुंदर बनाना है तो हम सबको मिलकर प्रयास करने होंगे जहां पर भी गंदगी के ढेर हैं आप वीडियो बनाएं सेल्फी ले फोटो खींचे और नेताओं और प्रशासन तक उसे पहुंचाएं, हमें जागरूक होना होगा तभी जाकर यह फरीदाबाद शहर हमारा स्वच्छ बन पाएगा। आप हमें इस नंबर पर वीडियो और फोटो भेज सकते हैं

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क्यों हर दो महीने में आता है बिजली का बिल?

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हम सभी अपने कुछ रोजमर्रा में प्रयोग होने वाली चीजों के बिलों का भुगतान हर महीने करते हैं। जैसे बैकों की किश्तंे, घर का किराया इत्यादि। लेकिन क्या आपने कभी इस बात पर गौर फरमाया है कि जब हर चीज का भुगतान हम महीने दर महीने करते हैं। तो बिजली के बिल का ही भुगतान हर दो महीने में क्यों?

इस पर बिजली निगम का कहना है कि बिलिंग प्रक्रिया से जुड़ी एक लागत होती है। जिसमें मीटर रीड़िंग की लागत, कम्प्यूटरीकृत प्रणाली में रीडिंग फीड़ करने की लागत, बिल जेनरेशन की लागत, प्रिंटिग और बिलों को वितरित करने की लागत आदि चीजें शामिल होती हैं। इन लागतों को कम करने के लिए बिलिंग की जाती हैं। इसलिए बिजली बिल 2 महीने में आता है।
फिलहाल बिजली निगम 0-50 यूनिट तक 1.45 रूपये प्रति यूनिट, 51-100 यूनिट तक 2.60 रूपये प्रति यूनिट चार्ज करता है।
आप यह अनुमान लगाइए कि यदि किसी छोटे परिवार की यूनिट 50 से कम आती है। तो उसका चार्ज 1.45 रूपये प्रति यूनिट होगा लेकिन जब बिल दो महीने में जारी होगा। तो उसका 100 यूनिट से उपर बिल आएगा। मतलब साफ है कि उसे प्रति यूनिट चार्ज 2.60 रूपये देना होगा । ऐसे में उस गरीब को सरकार की छूट का लाभ नहीं मिला लेकिन सरकार ने पूरी वाह-वाही लूट ली।
आप यह बताइए जिस घर में सदस्य कम है। तो उस घर की बिजली खपत भी कम होगी और बिल भी कम ही आएगा। मतलब साफ है उपयोग कम तो यूनिट भी कम। यदि बिजली बिल एक महीने में आता है तभी ही तो जनता को इसका लाभ मिलेगा।
लेकिन चूंकि बिल दो महीने में आता है इसलिए गरीब को या छोटे परिवार को महंगी बिजली प्रयोग करनी पड़ रही है।
एक तरफ बिजली निगम अपना फायदा देख रहा है। तो दूसरी तरफ सरकार सस्ती बिजली की घोषणा करके, एक राजनीतिक मुद्द्ा बना कर, जनता की वाह-वाही लूट रही है। लेकिन जनता को लाभ मिल ही नहीं रहा क्योंकि सरकार तो दो महीने में लोगों को बिल दे रही हैं। इसलिए जब महीने में एक बार बिल आएगा तभी आम जनता को लाभ प्राप्त होगा। सरकार कब तक जनता को अपने घोषणाओं के जाल में फंसाती रहेगी? कब जनता को अपनी दी हुई पूंजी का सही लाभ प्राप्त होगा?

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क्यों राहुल गांधी बिना किसी बात के भी फंस जाते हैं?

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आई ए एस अधिकारी टीना डाबी को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी एक बार फिर सोशल मीडिया में ट्रोल हो गए हैं। खबर बस इतनी है कि दलित समाज से आने वाली टीना मुस्लिम समाज से आने वाले अपने पति अतहर से तलाक ले रहीं हैं।

दिल्ली शहर की रहने वाली 24 वर्षीय टीना डाबी जो 2015 की सिविल परीक्षा में टाॅप करके आई ए एस अधिकारी बनी थी। उन्होंने कश्मीर के मटट्न नामक शहर में रहने वाले अतहर खान से शादी कर ली जो उसी परीक्षा में दूसरे स्थान पर था।
टीना पहली दलित महिला थी जिसने यूपीएससी की परीक्षा में टाॅप किया था।
टीना और अतहर की शादीशुदा जोड़ी को उनके विवाह के दौरान जय भीम और जय मीम की एकता, मुस्लमान और दलितों के बीच में सबधों की मिसाल बताया गया था। उस समय राहुल गांधी ने स्वंय अपने ट्वीटर अकांउट से ट्वीट करते हुए कहा था कि ये जोड़ी मिसाल कायम करेगी। यह हिंदू, मुस्लमानों की एकता का प्रतीक है।
लेकिन आपसी मतभेदों के कारण जयपुर के पारिवारिक न्यायालय में इस जोड़ी ने तलाक की अर्जी दाखिल की है। अब ये जोड़ी तलाक ले रही हैं और लोग राहुल गांधी को लानत दे रहे हैं ‘दिख गई सहजता। दिखा लिया भाईचारा।।‘
आज कांग्रेस की जो हालत है या राहुल गांधी की जो हालत है वो इस वजह से है क्योंकि राहुल ने हर मुद्दे में केवल जाति व धर्म का एंगल खोजा और उसका तुष्टीकरण किया। उन्होंने सर्व समाज से बातें करने में हमेशा परहेज किया। केवल धर्म और जातियों में खास दृष्टिकोण खोजते रहे।
अब तक देखने में आया है कि घटना किसी दलित के साथ हुई है तो वह एक्शन लंेगे और यदि वह दलित कांग्रेस शासित राज्य में है तो एक्शन नहीं लेंगे। उसी प्रकार कोई घटना मुस्लिम के साथ है तो वह आवाज उठाएंगे और यदि वह मुस्लिम अपने शासित राज्य में है तो वो आवाज दबा दंेगे।
इसी कारण से कांग्रेस की हालत यह हो गई है कि लोग उन्हें धर्म और जाति का मुद्दा उठते ही लोग लानत देने लगते हैं।

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