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भ्रष्टाचार दूर करने की बजाय, विरोध दबा रही सरकार

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Pushpanjali

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जो विदेशों से काले धन लाने के मुद्दे पर सत्ता में आये थे, उनकी सरकार में देश का सूरत-ए हाल यह है कि पिछले 2 साल में देश में भ्रष्टाचार का ग्राफ तेजी से बढ़ा है आय दिन देशमें ऐसे मसलें होते हैं जिसे बिहार में नितीश सरकार उत्तर प्रदेश में योगी सरकार और तो और बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा देने वाली मोदी सरकार भी चुप्पी साधें हुए है ऐसे में एक सर्वे के अनुसार देश के 13 राज्यों के 75 प्रतिशत परिवारों का मानना है कि पिछले दो साल के दौरान भ्रष्टाचार या तो बढ़ा है या पुराने स्तर पर टिका रहा है| वहीं 27 प्रतिशत ने पिछले एक साल के दौरान किसी सार्वजनिक सुविधा के लिए घूस देने की बात स्वीकार की गैर लाभकारी संगठन सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमएस) द्वारा किए गए सर्वेक्षण ‘इंडिया करप्शन स्टडी’ में 13 राज्यों आंध्र प्रदेश, बिहार, दिल्ली, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल के 200 से अधिक ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों के दो हजार से अधिक लोग शामिल हुए|

वहीं सर्वेक्षण में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस), बिजली, चिकित्सा, न्यायिक सेवाएं, भूमि-आवास, परिवहन, महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना शामिल रहे|सीएमएस के सर्वेक्षण के अनुसार 13 राज्यों में लोगों ने इन सेवाओं के लिए इस दौरान 25 सौ से 28 सौ करोड़ रुपए के घूस दिए| उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह ने सीएमएस के चेयरमैन डॉ एन भाष्कर राव के साथ रिपोर्ट में कहा कि लोगों ने पहचान पत्र बनवाने के लिए भी घूस देने की बातेंस्वीकार की| करीब सात प्रतिशत लोगों ने आधार कार्ड बनवाने तथा तीन प्रतिशत लोगों ने मतदाता पहचान पत्र बनवाने के लिए घूस देने की बातें स्वीकार की|

इसके अलावा सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को रातों रात मोदी सरकार ने छुट्टी पर भेज दिया इसमें भी उनका कोई ऐसा ही मसला हैं जो जनता के सामने नहीं आने देना चाहतेथे इसलिए उन्होंने ऐसा करना ठीक समझा जैसा की सीबीआई डायरेक्टर की नियुक्ति 3 लोगों की समिति करती है| पीएम, नेता विपक्ष और सीजेआई| सीबीआई डायरेक्टर कोपीएम ने रात 2 बजे हटाया, यह भारत के संविधान, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया, विपक्ष के नेता और भारत के लोगों का अपमान है| आलोक वर्मा को रात के 2 बजे छुट्टी पर भेजेजाने को राफेल डील में कथित भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने की कोशिश है प्रधानमंत्री जानते हैं कि यदि राफेल की जांच शुरू हो गई तो वह खत्म हो जाएंगे और यही उनकी घबराहटहै| अगर सीबीआई जांच शुरू हो जाती तो दूध का दूध, पानी का पानी हो जाता और इससे घबराकर, डरकर प्रधानमंत्री ने सीबीआई डायरेक्टर को हटा दिया | वहीं प्रधानमंत्रीसिर्फ सीबीआई डायरेक्टर को हटा नहीं रहे हैं बल्कि, सबूतों को मिटाने का काम भी कर रहे हैं| ये देश प्रधानमंत्री को उनके भ्रष्टाचार को भूलने नहीं देगा|

यह सच है कि भारतमहाशक्ति बनने के करीब है परन्तु हम भ्रष्टाचार की वजह से इस से दूर होते जा रहे हैभारत के नेताओ को जब अपने फालतू के कार्यों से फुरसत मिले तब ही तो वो इस सम्बन्धमें सोच सकते है वर्ष 2014 में केंद्र में जब नरेंद्र मोदी की सरकार बनी तो भारतीय जनता को एक आस जगी की शायद अब भारत में भ्रष्टाचार दूर होगा युवाओं को रोज़गार मिलेगा लेकिन भाजपा सरकार लोगों के इस आस को कायम नहीं कर पाई केंद्र में भाजपा सरकार की 5 साल की कार्यकाल पूरे होने को आए लेकिन न तो  देश में भ्रष्टाचार थमने का नाम ले रहा न ही पढ़े-युवाओं को रोज़गार मिल पाया ऐसे में अब और क्या आस इस सरकार से लगाई जा सकती है देश के महाशक्ति बनने में जो रोडा है वो है भारतीयनेता| युवाओ को इस के लिये इनके खिलाफ लडना पडेगा, आज देश को महाशक्ति बनाने के लिये एक महाक्रान्ति की जरुरत है, क्योकि बदलाव के लिये क्रान्ति की हीआवश्यकता होती है लेकिन इस बात का ध्यान रखना पडेगा की भारत के रशिया जैसे महाशक्तिशाली देश की तरह टुकडे न हो जाये, अपने को बचाने के लिये ये नेता कभी भी रूपबदल सकते है| जिसके लिए भारत के हर नागरिक को जागने की जरूरत है|

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किसानों की कर्ज माफी समाधान से ज्यादा समस्या

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Awadhesh kumar

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इसका उत्तर देने के लिए कई पहलुओं पर गंभीरता से विचार करना होगा। पार्टियां और सरकारें सभी किसानों के कर्ज माफी की घोषणा करती हैं, पर सारे किसान इसके दायरे में नहीं आते, न ही सारे कर्ज। उदाहरण के लिए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि 30 नवंबर 2018 की स्थिति के अनुसार सहकारी बैंक व छत्तीसगढ़ ग्रामीण बैंक में कृषकों के अल्पकालीन ऋण को माफ कर दिया गया। इन दो श्रेणियों के बैंकों से जिन किसानों ने अल्पकालिक कर्ज लिया होगा उनका ही बोझ उतरेगा। अधिसूचित वाणिज्यिक बैंकों के अल्पकालीन कृषि ऋण के परीक्षण के बाद कृषि कर्ज को माफ करने की कार्रवाई की जाएगी। राजस्थान में गहलोत के शब्दों में किसानों का सहकारी बैंकों का सारा कर्ज माफ किया जाएगा तथा वाणिज्यिक, राष्ट्रीयकृत व ग्रामीण बैंकों में कर्जमाफी की सीमा दो लाख रुपये रहेगी। गणना के लिए 31 नवंबर 2018 की समयसीमा तय की गई है। इससे खजाने पर करीब 18000 करोड़ रुपये का बोझ आएगा। मध्यप्रदेश में घोषणा हो गई लेकिन राज्य स्तर से लेकर जिला स्तर तक गठित समितियों की रिपोर्ट के आधार पर पात्रता और मापदंड तय होंगे और उसके बाद कर्ज माफी प्रमाण पत्र वितिरत किए जाएंगे। कहने का तात्पर्य यह कि चुनावी वायदा करने के बाद यथार्थ का सामना करना पड़ता है और माफी की राजनीतिक घोषणा के बावजूद इसका क्रियान्वयन वैसे ही नहीं होता जैसी कल्पना की जाती है। इसके रास्ते अनेक समस्यायें सामने आतीं हैं। इनमें प्रदेश की माली हालत सर्वप्रमुख है।

अगर राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा हुआ तो स्थिति कितनी विकट होगी इसकी कल्पना करिए। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए 1 सरकार ने 2008 में 3.73 करोड़ किसानों के 52,260 करोड़ रुपया कर्ज माफ किया था। वित्तीय स्थिति पर उतनी राशि का भी असर पड़ा। आज की स्थिति क्या है? वित्त मंत्रालय की तरफ से 17 दिसंबर को संसद में बताया गया कि वर्ष 2017-18 में 7.53 लाख करोड़ रुपये का फसल कर्ज दिया गया। वर्तमान वित्त वर्ष का आंकड़ा नहीं आया है, लेकिन यह 9 लाख करोड़ रुपये के आसपास है। हमारा कुल बजट 24 लाख करोड़ रुपये का है। अगर यह पूरी राशि माफ कर दी जाए तो राजकोषीय घाटा कुछ समय के लिए सीधे 7 प्रतिशत के आसपास पहुंच जाएगा। यह किसी भी खजाने के लिए खतरे की घंटी होती है। केवल छोटे और सीमांत किसानों का माफ किया गया तो क्या होगा? किसान कर्ज में सीमांत व छोटे किसानों की हिस्सेदारी लगभग 80 प्रतिशत होती है, लेकिन संस्थागत कर्ज में उनकी हिस्सेदारी 60 प्रतिशत है। इसके अनुसार भी हिंसाब लगाये तो 5 लाख करोड़ से ज्यादा की राशि चाहिए। यह देश के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग तीन प्रतिशत है। यही राजकोषीय स्थिति को चरमरा देगा। कहने की आवश्यकता यह कि राजनीतिक लोकप्रियतावाद का यह अतार्किक होड़ आत्मघाती है। एक राज्य में कर्ज माफी के वादे का असर देश भर में पड़ता है और लोग कर्ज वापस करना बंद कर देते हैं। कांग्रेस की घोषणा के बाद बैंकों ने वित्त मंत्रालय के समक्ष यह बात उठाई थी कि छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान से किसानों से कर्ज वसूलना मुश्किल हो गया है। लोग सोचते हैं कि माफ होना ही है तो कर्ज वापस करने की आवश्यकता क्या है। यूपीए सरकार द्वारा वर्ष 2008 में कर्ज माफी के बाद दो वर्षों तक कृषि कर्जों की वसूली कठिन हो गई थी। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों को देखें तो वर्ष 2012 में कृषि क्षेत्र में फंसे कर्जे यानी एनपीए की राशि 24,800 करोड़ रुपये थी जो 2017 में बढ़ कर 60,200 करोड़ रुपये हो गई। आगे भी ऐसे ही होने का खतरा बढ़ गया है। कृषि का नाम पर लिए गए कर्ज के अधिकांश भाग का एनपीए बनना तय है।

निस्संदेह, वास्तविक किसानों की दशा बुरी है और उनकी पीठ पर हाथ रखने की आवश्यकता है। किंतु कर्ज माफी समाधान नहीं समस्या है। ग्रामीण कर्ज पर हुए अध्ययनों से पता चलता है कि छोटे और सीमांत किसानों पर कर्ज का बोझ काफी है लेकिन उनमें से ज्यादा गैर बैंकिंग स्रोतों से लिया गया है। छोटा किसान बैंक के दरवाजे पर आज भी नहीं जाता है। वे आसपास के लोगों से कर्ज लेते हैं। इनको माफी से लाभ नहीं। कर्ज माफी की अपसंस्कृति के कारण गांव-गांव में धूर्त लोग कृषि के नाम पर कर्ज लेकर लौटाने की नहीं सोचते। 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार द्वारा कर्ज माफी के बाद से यह चरित्र पैदा हुआ है। सरकारों के पास ऐसी कोई मशीनरी नहीं जो पता कर सके कि किन किसानों के पास गैर बैंकिंग कर्ज कितना है। यह भी पता नहीं किया जाता कि कृषि के नाम पर लिए गए कर्ज में कितने वाकई कृषि के लिए ही लिया गया। उनमें कितनों की दशा कृषि के कारण बुरी है और उनको माफी की आवश्यकता है। इस तरह इससे वास्तविक किसानों का अत्यंत कम लाभ मिलता है।

माफ करने के बाद सरकारों को बैंकों को राशि चुकानी होती है। जाहिर है, माफ की गई राशि की पूर्ति सरकारें करों से ही करती है। हम आप जो कर देंगे उनसे ही इसकी पूर्ति की जाएगी। तो भार हमारे-आपके सिर ही आना है। अगर इससे वास्तविक किसानों का वास्तविक भला होता तो एक बार भार झेल लेने में समस्या नहीं थी। किंतु कर्जमाफी से किसानों की दशा सुधरी हो इसके कोई प्रमाण नहीं है। इसकी जगह किसानों की दशा सुधारने के लिए कृषि से संबंधित मूलभूत संरचना और संसाधन विकसित हों। कृषि सम्मान का पेशा बने, उसकी लागत कम हो, बीज, उर्वरक और सिंचाई तो उचित मूल्य पर उपलब्ध हो ही फसलों का उचित मूल्य भी मिले, कृषि बीमा योजना व्यवाहारिक रुप से लागू हो, आम आवश्यकता की सेवाएं यानी स्वास्थ्य, शिक्षा आदि तथा वस्तुएं उनको उचित मूल्य पर उपलब्ध हों……इन सबकी व्यवस्था हो। कर्ज माफी की राशि इन पर खर्च हो तो उसका स्थायी लाभ मिलेगा। सबसे बड़ी समस्या कृषि श्रमिकों की अनुपलब्धता है। यह बहुत बड़ा खर्च भी है। यदि मनरेगा को खेती से संबद्ध कर दिया जाए तो लघु और सीमांत किसानों का श्रमिकों का संकट दूर होगा और बहुत बड़ी राशि बचेगी।

अवधेश कुमार, ईः30, गणेश नगर,

पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः 110092

दूरभाषः 01122483408, 9811027208

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बक Lol

अशांति फैलाने वाले पाकिस्तान को क्यों याद आ रही शांति

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Pushpanjali

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भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध भले ही भारत और पाकिस्‍तान को आजादी मिल गई हो लेकिन आज भी दोनों देश एक-दूसरे की नफरत में जकड़े हुए हैं| आजादी के बाद से अब तक भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध चार बार हो चूका है लेकिन फिर भी पाक के दिमाग में ये बात नहीं बैठती है कि वो भारत का मुकाबला करने के काबिल नहीं है और अमन और शांति का रास्‍ता ही सबसे सही है| भारत के लिए अपने दिल में नफरत पाले पाकिस्‍तान हर बार कुछ ना कुछ नापाक करता रहता है इसलिए कभी ना कभी इन हरकतों की वजह से युद्ध छिड़ सकता है| आज पाक के रुख को देखकर आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि वो कभी भी लड़ने को तैयार रहता है और ऐसे में हर समय दोनों पड़ोसी देशों के बीच युद्ध का मंजर बना रहता है| भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध जब होगा तो बहुत करोड़ों रुपयों का नुकसान होगा साथ ही आर्थिक तंगी के दलदल में दोनों ही देश फंस सकते हैं| अब तक जो चार युद्ध हुए हैं उसमें पाकिस्‍तान ने अपनी 13880 के लगभग सैनिको की जान गंवाई थी और भारत के लगभग 8750 सैनिक मारे गए थे|

केवल नारे देते हैं बेटियां अब भी नहीं सुरक्षित

नोबल पुरस्‍कार विजेता इंटरनेशनल ऑफ न्‍यूक्‍लियर वॉर तथा फिजीशियन रिस्‍पॉन्सिबिलिटी के द्वारा करवाए गए एक अध्‍ययन के अनुसार भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध विश्‍वयुद्ध हो सकता है और उस युद्ध से पूरी मानव जाति तक खत्‍म हो सकती है| अब तो आप समझ ही गए होंगें कि भारत और पाकिस्‍तान के बीच अगर युद्ध होता है तो उसका अंजाम कितना भयंकर होगा| भले ही आज पाकिस्‍तान ने बहुत तरक्‍की कर ली हो लेकिन फिर भी वो कई मामलों में भारत से पीछे ही है| वहां पर महिलाओं को इतनी आज़ादी नहीं है जितनी भारत में है| भले ही भारत भी महिलाओं की सुरक्षा के मामले में फेल हो लेकिन यहां पर महिलाओं के हक और अधिकार का हनन नहीं होता है| भारत में शिक्षा के ऊपर पाकिस्‍तान से तो ज्‍यादा ही ध्‍यान दिया जाता है| पाक में मदरसों के अंदर छोटे बच्‍चों को हथियार चलाना सिखाया जाता है बल्कि भारत में बच्‍चों को भगवान का रूप माना जाता है| पाकिस्‍तान में महिलाओं के साथ-साथ बच्‍चों की स्थिति भी बहुत खराब है| वहां पर उनके अधिकारों का हनन कर उन्‍हें अच्‍छी तालीम से वंचित कर दिया जाता है| कई जगहों पर तो आंतकी तालीम भी दी जाती है|

भ्रष्टाचार दूर करने की बजाय, विरोध दबा रही सरकार

पाकिस्‍तान एक इस्‍लामिक देश है इसलिए वहां पर मर्दों को एक से ज्‍यादा विवाह करने की छूट है और वहां पर तीन तलाक भी खूब जोरो से चलता है जबकि हाल ही में महिलाओं के विरोध पर भारत में तीन तलाक को बैन कर दिया गया है| इस तीन तलाक की वजह से ना जाने कितने ही घर उजड़ गए और कितने ही बच्‍चे अनाथ हो गए| पाक में भी भी ये सिलसिला जारी है| कई मामलों में पाकिस्‍तान भारत से पिछड़ा हुआ है और उसकी आर्थिक स्थिति भी कुछ बहुत ज्‍यादा अच्‍छी नहीं है लेकिन फिर भी उसे ना जाने किस बात का घमंड है जो वो दोस्‍ती का रिश्‍ता नहीं बना सकता है|

पाक‍िस्तानी ह‍िस्से में करतारपुर साहिब कॉरिडोर की आधारशिला रखी गई जोकि एलओसी से करीबन साढ़े तीन किलोमीटर दूर सिखों के लिए यह आस्था का बड़ा केंद्र है| दोनों देशों के बीच तनाव के चलते इस गलियारे को अब तक नहीं खोला जा सका था| हर सिख की यही मांग थी जो 70 साल नहीं हो पाया, वो अब पूरा हुआ है| गुरु नानक साहब ने अपना आखिरी समय जिस धरती पर बिताया, उस 4 किमी का ये फासला पूरा करने में 70 साल लग गए| पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान का कहना है कि जब मैं सियासत में आया तो ऐसे लोगों से मिला जो बस अपने लिए ही काम करते थे, आवाम को भूल जाते थे एक दूसरे किस्म का राजनेता है तो नफरतों के नाम पर नहीं बल्कि काम के नाम पर राजनीति करता था| आज जहां पाकिस्तान-हिंदुस्तान खड़े हैं, 70 साल से ऐसा ही हो रहा है| दोनों तरफ गलतियां हुईं लेकिन हम जब तक आगे नहीं बढ़ेंगे, जंजीर नहीं टूटेगी|

सरकार जनता के मत से चलेगी सियासतदानों के मन से नहीं

इमरान खान का कहना है कि हम एक कदम आगे बढ़कर दो कदम पीछे हट जाते हैं| हममें ये ताकत नहीं आई है कि कुछ भी हो हम रिश्ते ठीक करेंगे| अगर फ्रांस-जर्मनी एक साथ आ सकते हैं, तो फिर पाकिस्तान-हिंदुस्तान भी ऐसा क्यों नहीं कर सकते है| हमने भी एक-दूसरे के लोग मारे हैं, लेकिन फिर भी सब भूला जा सकता है| हमेशा कहा जाता था कि पाकिस्तान की फौज दोस्ती नहीं होने देगी, लेकिन आज हमारी पार्टी-पीएम-फौज एक साथ हैं| इमरान ने कश्मीर पर बोलते हुए कहा क‍ि हमारा मसला सिर्फ कश्मीर का है| इंसान चांद पर पहुंच चुका है लेकिन हम एक मसला हल नहीं कर पा रहे हैं| ये मसला जरूर हल हो जाएगा| इसके लिए पक्का फैसला जरूरी है अगर हिंदुस्तान एक कदम आगे बढ़ाएगा तो हम दो कदम आगे बढ़ाएंगे|

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ये लेख राजस्थान में चुनावी प्रचार का संदेश

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Lalit Garg

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राजस्थान में विधानसभा चुनाव 2018 के लिए मतदान का काउंटडाउन शुरू हो चुका है। मतदान के लिए अब कुछ दिन शेष रहे हैं। यही कारण है कि चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में बीजेपी, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक दल, भारत वाहिनी पार्टी समेत तमाम दल और निर्दलीय उम्मीदवारों ने प्रचार में अपनी पूरी ताकत झोंक दी हैं। लेकिन हर क्षण बदलते राजनीतिक समीकरण कांग्रेस की जीत को हार की ओर ले जा रहे हैं। दो-तिहाई सीटों की जीत के साथ आगे बढ़ रही कांग्रेस पार्टी के लिये स्पष्ट बहुमत मिलना भी जटिल होता जा रहा है, क्या यह मोदी का जादू है या कांग्रेस पार्टी का चुनावी प्रचार का विसंगतिपूर्ण होना। यह स्थिति बनने का कारण आपसी मतभेद या मुख्यमंत्री पद की दावेदारी का प्रश्न है या राहुल गांधी की अस्वीकार्यता? जो भी स्थिति बनी हो, लेकिन कांग्रेस को उस पर मंथन करना चाहिए।

राजस्थान में प्रचार के अन्तिम दौर में भाजपा-कांग्रेस ने एक-दूसरे पर हमले तेज कर दिए हैं। जोधपुर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राहुल गांधी के हिंदुत्व वाले बयान समेत कई मुद्दों पर कांग्रेस को घेरा। बीते दिनों राहुल गांधी ने पीएम मोदी पर हल्ला बोलते हुए कहा था कि वे किस तरह के हिंदू हैं। इसका जवाब देते हुए मोदी ने कहा कि हिंदुत्व का ज्ञान देने वाले मेरी जाति पूछते हैं। हिंदुत्व हिमालय से भी ऊंचा और समंदर से भी गहरा है। ऋषि-मुनियों ने भी कभी दावा नहीं किया कि उन्हें हिंदुत्व और हिंदू का पूरा ज्ञान है। मैं ऐसा दावा नहीं कर सकता, नामदार कर सकते हैं। मोदी को हिन्दुत्व का ज्ञान है या नहीं, लेकिन लगता है कि राजस्थान में इसीे मुद्दे पर वोट पड़ने वाले है। मुझे लगता है कि कांग्रेस सहित विपक्षी दलों को अब यह समझ लेना चाहिए कि यह चुनाव एवं आने वाले चुनाव हिन्दुत्व के मुद्दे पर ही हार-जीत को तय करेंगे। हिन्दू राष्ट्र में हिन्दुत्व की उपेक्षा कब तक सहनीय होगी? शायद इस बात की गहराई को कांग्रेस समझने लगी है तभी वह भी हिन्दुत्व को मुद्दा बनाने की कोशिश कर ही है। भाजपा के हिन्दुत्व की काट के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी दत्तात्रेय ब्राह्मण के अवतार के रूप में स्वयं को प्रस्तुत कर रहे हैं। कभी वे मन्दिर की चैखट चढ़ रहे हैं तो कभी हिन्दू धर्मगुरुओं का सहारा ले रहे हैं। कुछ भी हो भाजपा के नेता जहां मानकर चल रहे हैं कि पीएम मोदी के प्रचार के लिए आने के बाद लड़ाई दिलचस्प हो गई है, वहीं कांग्रेस पार्टी के नेताओं को जीत का पूरा भरोसा भी लडखड़ाता दिख रहा है।

देश दुनिया के इतिहास में पांच दिसंबर की तारीख

सत्य तो यह भी है कि राजस्थान में चुनावी हवाओं में वसुंधरा राजे और उनकी सरकार को लेकर विरोधी लहर के स्वर भी व्यापक है। लेकिन पूरे राजस्थान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जनता का जुड़ाव बना हुआ है। उनकी जनसभाओं में जमकर भीड़ उमड़ रही है। बताते हैं कि  प्रदेश के हर हिस्से से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मांग भी बहुत देखने को मिली है। पिछले दो सप्ताह के दौरान राजस्थान में भाजपा की स्थिति काफी मजबूत हुई है। इसकी वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रचार में उतरना रहा है और उनके द्वारा हिन्दुत्व को प्रभावी मुद्दे के रूप में प्रस्तुति देना रहा है। राज्य में मुख्यमंत्री के चेहरे की बात करें तो पहले नंबर पर राज्य के लोगों की पसंद अशोक गहलोत हैं। दूसरे नंबर पर वसुंधरा राजे और उन्हीं के आसपास सचिन पायलट की छवि है। राज्य की जनता प्रधानमंत्री से नाराज नहीं है। हां, वसुंधरा सरकार से नाराजगी जरूर है।

राजस्थान में कांग्रेस ने जीती पारी को हार की ओर धकेला है। यदि यह चुनाव अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में आगे लाकर लड़ा जाता तो जीत की संभावनाएं कायम रहती। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट टोंक विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। उनके मुकाबले में भाजपा के एकमात्र अल्पसंख्यक उम्मीदवार वसुंधरा सरकार में मंत्री रहे यूनुस खान हैं। टोंक में मुस्लिम आबादी भी ठीक-ठाक है। यूनुस खान का रिकॉर्ड भी दुरुस्त है। वह वसुंधरा सरकार में अच्छा काम करने वाले मंत्रियों में हैं। क्षेत्र की जनता भी उनपर भरोसा करती है। वह वसुंधरा की भी पसंद बताए जाते हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि टोंक में  भाजपा और कांग्रेस में कड़ा मुकाबला हो गया है। सचिन पायलट के लिए यह सीट जहां प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई है, वहीं भाजपा ने उन्हें पूरी तरह से घेर कर रखने की रणनीति को और तेज धार दे दी है।

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम जो भी हो, लेकिन यह स्पष्ट संकेत हैं कि कांग्रेस पुनर्जीवित हो रही है। लेकिन पुनर्जीवित होना जीत की गारंटी नहीं है। क्योंकि चुनावी राजनीति में ‘जो जीता वही सिकंदर’ होता है। लेकिन परिवर्तन की इच्छा का संकेत मिलना इस पार्टी के शुभ भविष्य का द्योतक है।  अब कांग्रेस को अपनी सोच एवं कार्यक्रमों में बडे़ बदलाव जारी रखने होंगे।  2019 के लोकसभा चुनाव का नतीजा इस बात पर निर्भर करेगा कि कांग्रेस स्वयं को कितना बदलती है, कितनी मजबूत होती, कितना अपनी गलतियों को सुधारती है, इसी पर स्थितियां और भी करवट लेंगी।

अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत को मिली एक और बड़ी कामयाबी

पांच राज्यों के नतीजे क्या होंगे? कैसे होंगे? चार राज्यों में मतदान हो चुके हैं और राजस्थान में मत अभी पड़ेंगे। कौन जीतेगा? कौन हारेगा? यह मायने रखता है- लेकिन इससे भी ज्यादा मायने रखता है कि इस बार जो लोगों की आकांक्षाएं बनी हैं, वह कौन, किस तरह पूरी करेगा? जनमत का फलसफा यही है और जनमत का आदेश भी यही है कि चुने हुए प्रतिनिधि मतदाताओं के मत के साथ उनकी भावनाओं को भी उतना ही अधिमान दें। मतदाताओं को लुभाने एवं ठगने की मानसिकता बहुत हो चुकी है, वह अब समझदार हो चुका है। मतदाताओं की भावनाओं से खिलवाड़ करने की स्थितियों पर नियंत्रण करके ही सही अर्थों में लोकतंत्र का स्वरूप बनेगा अन्यथा असंतोष किसी न किसी स्तर पर व्याप्त रहेगा।

लोग राजनीति, अर्थनीति, समाजनीति यहां तक कि गृहनीति में भी परिवर्तन चाहते हैं। इसका माध्यम जन प्रतिनिधियों को चुनकर या बदल कर भेजना ही एक मात्र हथियार उनके पास रह जाता है। पर केवल राजनीतिज्ञ ही क्या यह कर पाएंगे? तो फिर उनसे ही इतनी अपेक्षाएं क्यों बन जाती हैं। आवश्यक है राजनेताओं, जितना महत्व उन प्रथम पंक्ति के व्यक्तियों का भी स्थापित हो, जो राजनीति से इतर अन्य क्षेत्रों में जीवन खपाए हुए हैं।

इस बार चुनाव में धार्मिक और साम्प्रदायिक भावनाओं को बहुत उभारा गया। परोक्ष और अपरोक्ष रूप से लगभग सारी चुनावी रणनीति और लगभग सारी पार्टियां धर्म, जाति और भाषा के चारों तरफ कुंडली मार कर बैठी रहीं। बेशुमार धन व साधनों का प्रयोग हुआ। नीति और कूटनीति चली। इस दिशा में कोई साफ एवं स्वस्थ स्तर नहीं रहा। ”खेत कभी झूठ नहीं बोलता“- जो देंगे, वही वापस मिलेगा। कोई भी चुना जाए, सभी भारतीय समाज के हैं, अपने में से ही हैं, समाज के प्रतिबिम्ब हैं। समाज से भिन्न कल्पना भी मात्र कल्पना होगी। हम यह नहीं चाहेंगे कि नीतियां, प्रणालियां बदलें चाहे न बदलें, प्रतिनिधि बदल जायेंगे। जायज  यह होगा कि नीतियां और प्रणालियां बदल जायेंगे क्योंकि प्रतिनिधिस्वरूप तो पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों में वही चेहरे हैं जो अब तक देखते आए हैं। नये चेहरे नहीं के बराबर हैं। अतः विकल्प और चयन सिमटा हुआ है।

ऊँट की मृत्यु बना बैराग्य का कारण

करोड़ों देशवासियों की भी अपनी किस्मत है, हम तो मंगल की ही कामना कर सकते हैं कि राजस्थान या शेष चार राज्यों में कोई भी आये, चाहे भाजपा आये या कांग्रेस या अन्य- पर मर्यादा आये, सहिष्णुता आये, ईमानदारी आये, प्रामाणिकता आये, राष्ट्रीय चरित्र आये। ईमानदार एवं चरित्रवान नेतृत्व ही लोकतंत्र को सुदृढ़ता दे सकेगा।

(ललित गर्ग)
बी-380, निर्माण विहार, दूसरा माला दिल्ली-110092
मो: 9811051133
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