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सरकार जनता के मत से चलेगी सियासतदानों के मन से नहीं

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Pushpanjali

whitemirchi.com

पूरे देश में हर पांच साल में एक ही बार में लोकसभा और तमाम विधानसभाओं के चुनाव करा लेने का विचार काफी समय से राजनीति में चलता आ रहा है| अब सवाल यह उठता है कि कोई भी दल या संस्था एक राष्ट्र, एक चुनाव के प्रस्ताव को हड़बड़ी में लागू करने की बात नहीं कर सकता लेकिन चूंकि यह बात चर्चा में आ चुकी है, इसलिए यह उचित समय है जब इस बारे में पक्ष और विपक्ष के सारे तर्कों को समझने की कोशिश की जाए|

यह सही है कि भारत में चुनाव एक बड़ी कवायद है मिसाल के तौर पर, 2014 के लोकसभा चुनाव के समय देश में कुल 83.41 करोड़ वोटर थे उस चुनाव में 9.27 लाख पोलिंग बूथ थे हर बूथ के हिसाब से मतदान कर्मचारियों और सुरक्षा बलों की तैनाती से लेकर मतगणना तक को शामिल करें, तो यह सचमुच एक महंगी कवायद है|

कहा जाता है भारत एक धर्म निरपेक्ष राज्य है लेकिन ये बात भी सच है कि चुनाव के समय जाति और धर्म के मुद्दे अक्सर गर्म हो जाते हैं| भारत ने बेशक आधुनिक लोकतंत्र को अपनाया है, लेकिन भारतीय समाज अभी भी बुनियादी रूप से सामंती है और गोलबंदी के सबसे सहज तरीका आदिम पहचान है| जाति और धर्म के आधार पर चूंकि राजनीतिक गोलबंदी होती है, इसलिए राजनीतिक दल और कैंडिडेट इसे जगाने या उग्र बनाने में लग जाते हैं| जाति और धर्म के मुद्दों के आधार पर वोट मांगने पर कहने को पाबंदी है, लेकिन इसका पालन नहीं होता और इसे रोकने का कोई तरीका भी चुनाव आयोग के पास नहीं है| चुनाव घोषणापत्रों तक में जाति और धर्म के मुद्दे शामिल होते रहे हैं किसी विधानसभा चुनाव के लिए मुमकिन है कि जाति या धर्म का मुद्दा देश के किसी अन्य हिस्से में उछाल दिया जाए| इसके साथ ही लगातार औऱ बार बार चुनाव होते रहने का मतलब है कि देश में जाति और धर्म के मुद्दे लगातार गर्म ही रहेंगे|

भारत में चुनाव बड़े पैमाने पर पैसे का खेल बन चुका है| मतदाताओं को रिश्वत देने का भी चलन आम होता जा रहा है| नेताओं की तरफ से वोट की लालसा में शराब बांटी जाती है और गिफ्ट दिए जाते हैं| इस खर्च को कॉरपोरेट जगत से लिया जाता है और बदले में कॉरपोरेट जगत राजनीतिक दलों से फायदा लेता है| चुनाव के कारण विकास कार्यों में बाधा आने के तर्क में भी सीमित सच्चाई है| इसके साथ ही बाद के दो तर्क यानी जाति और धर्म की लगातार सुलगती भट्ठी और भ्रष्टाचार जो भारतीय समाज में आम होता जा रहा है|

बार-बार चुनाव होना फायदेमंद है: भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में जनता हर मुद्दे पर जनमत संग्रह करके अपनी राय नहीं दे सकती| प्राचीन रोम में यह होता था और स्वीट्जरलैंड में ऐसा अब भी होता है| स्वीट्जरलैंड 56 लाख नागरिकों के साथ जैसी व्यवस्था चलाता है, वह 83.4 करोड़ वोटर के साथ भारत नहीं कर सकता| यहां लोग अपने प्रतिनिधि चुनते हैं और राजकाज और नीतियां बनाने का जिम्मा उन्हें सौंपते हैं| ये जनप्रतिनिधि बेलगाम न हो जाएं, इसलिए हर पांच साल के अंतराल पर नए चुनाव की व्यवस्था है| चुनाव में हार जाने का डर किसी जनप्रतिनिधि को जवाबदेह और जिम्मेदार बनाता है| यह भय राजनीतिक दलों में भी होना चाहिए कि जनता किसी भी समय और किसी भी स्तर पर उसे और उसकी नीतियों को खारिज कर सकती है|

 

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नगर निगम ने फरीदाबाद शहर को बना दिया कूड़े का ढेर – जसवंत पवार

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वैसे तो फरीदाबाद शहर को अब स्मार्ट सीटी का दर्जा प्राप्त हो चूका है, परन्तु शहर के सड़कों पर गंदगी के ढेर  फरीदाबाद प्रशासन और नगर को आइना दिखा रहे हैं

शहर के अलग अलग मुख्य चौराहों और सड़कों पर पढ़े कूड़े के ढेर को लेकर समाज सेवी जसवंत पवार ने फरीदाबाद प्रशासन और नगर निगम कमिश्नर से पूछा है कि एक तरफ भारत के प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी कहते हैं कि स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत मुहिम को पूरे देश में चला रहे हैं वही नगर निगम इस पर पानी फेरता दिख रहे हैं फरीदाबाद में आज सड़कों पर देखे तो गंदगी के ढेर लगे हुए हैं पूरे शहर को इन्होंने गंदगी का ढेर बना दिया है। जिसके चलते फरीदाबाद शहर अभी तक एक बार भी स्वछता सर्वेक्षण में अपनी कोई अहम् भूमिका अदा नहीं कर पा रहा,  अगर ऐसे ही चलता रहा तो हमारा फरीदाबाद शहर स्वच्छता सर्वे में फिर से फिसड्डी आएगा। साल 2021 में स्वछता सर्वेक्षण 1 मार्च से 28 मार्च तक किया जाना है जिसको लेकर लगता नहीं की जिला प्रसाशन व फरीदाबाद के नेता और मंत्री फरीदाबाद शहर की स्वछता को लेकर बिल्कुल भी चिंतित दिखाई नहीं पढ़ते है।

जसवन्त पंवार ने फरीदाबाद वासियों से अनुरोध और निवेदन किया है अगर हमें अपना शहर स्वच्छ और सुंदर बनाना है तो हम सबको मिलकर प्रयास करने होंगे जहां पर भी गंदगी के ढेर हैं आप वीडियो बनाएं सेल्फी ले फोटो खींचे और नेताओं और प्रशासन तक उसे पहुंचाएं, हमें जागरूक होना होगा तभी जाकर यह फरीदाबाद शहर हमारा स्वच्छ बन पाएगा। आप हमें इस नंबर पर वीडियो और फोटो भेज सकते हैं

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क्यों हर दो महीने में आता है बिजली का बिल?

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हम सभी अपने कुछ रोजमर्रा में प्रयोग होने वाली चीजों के बिलों का भुगतान हर महीने करते हैं। जैसे बैकों की किश्तंे, घर का किराया इत्यादि। लेकिन क्या आपने कभी इस बात पर गौर फरमाया है कि जब हर चीज का भुगतान हम महीने दर महीने करते हैं। तो बिजली के बिल का ही भुगतान हर दो महीने में क्यों?

इस पर बिजली निगम का कहना है कि बिलिंग प्रक्रिया से जुड़ी एक लागत होती है। जिसमें मीटर रीड़िंग की लागत, कम्प्यूटरीकृत प्रणाली में रीडिंग फीड़ करने की लागत, बिल जेनरेशन की लागत, प्रिंटिग और बिलों को वितरित करने की लागत आदि चीजें शामिल होती हैं। इन लागतों को कम करने के लिए बिलिंग की जाती हैं। इसलिए बिजली बिल 2 महीने में आता है।
फिलहाल बिजली निगम 0-50 यूनिट तक 1.45 रूपये प्रति यूनिट, 51-100 यूनिट तक 2.60 रूपये प्रति यूनिट चार्ज करता है।
आप यह अनुमान लगाइए कि यदि किसी छोटे परिवार की यूनिट 50 से कम आती है। तो उसका चार्ज 1.45 रूपये प्रति यूनिट होगा लेकिन जब बिल दो महीने में जारी होगा। तो उसका 100 यूनिट से उपर बिल आएगा। मतलब साफ है कि उसे प्रति यूनिट चार्ज 2.60 रूपये देना होगा । ऐसे में उस गरीब को सरकार की छूट का लाभ नहीं मिला लेकिन सरकार ने पूरी वाह-वाही लूट ली।
आप यह बताइए जिस घर में सदस्य कम है। तो उस घर की बिजली खपत भी कम होगी और बिल भी कम ही आएगा। मतलब साफ है उपयोग कम तो यूनिट भी कम। यदि बिजली बिल एक महीने में आता है तभी ही तो जनता को इसका लाभ मिलेगा।
लेकिन चूंकि बिल दो महीने में आता है इसलिए गरीब को या छोटे परिवार को महंगी बिजली प्रयोग करनी पड़ रही है।
एक तरफ बिजली निगम अपना फायदा देख रहा है। तो दूसरी तरफ सरकार सस्ती बिजली की घोषणा करके, एक राजनीतिक मुद्द्ा बना कर, जनता की वाह-वाही लूट रही है। लेकिन जनता को लाभ मिल ही नहीं रहा क्योंकि सरकार तो दो महीने में लोगों को बिल दे रही हैं। इसलिए जब महीने में एक बार बिल आएगा तभी आम जनता को लाभ प्राप्त होगा। सरकार कब तक जनता को अपने घोषणाओं के जाल में फंसाती रहेगी? कब जनता को अपनी दी हुई पूंजी का सही लाभ प्राप्त होगा?

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क्यों राहुल गांधी बिना किसी बात के भी फंस जाते हैं?

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आई ए एस अधिकारी टीना डाबी को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी एक बार फिर सोशल मीडिया में ट्रोल हो गए हैं। खबर बस इतनी है कि दलित समाज से आने वाली टीना मुस्लिम समाज से आने वाले अपने पति अतहर से तलाक ले रहीं हैं।

दिल्ली शहर की रहने वाली 24 वर्षीय टीना डाबी जो 2015 की सिविल परीक्षा में टाॅप करके आई ए एस अधिकारी बनी थी। उन्होंने कश्मीर के मटट्न नामक शहर में रहने वाले अतहर खान से शादी कर ली जो उसी परीक्षा में दूसरे स्थान पर था।
टीना पहली दलित महिला थी जिसने यूपीएससी की परीक्षा में टाॅप किया था।
टीना और अतहर की शादीशुदा जोड़ी को उनके विवाह के दौरान जय भीम और जय मीम की एकता, मुस्लमान और दलितों के बीच में सबधों की मिसाल बताया गया था। उस समय राहुल गांधी ने स्वंय अपने ट्वीटर अकांउट से ट्वीट करते हुए कहा था कि ये जोड़ी मिसाल कायम करेगी। यह हिंदू, मुस्लमानों की एकता का प्रतीक है।
लेकिन आपसी मतभेदों के कारण जयपुर के पारिवारिक न्यायालय में इस जोड़ी ने तलाक की अर्जी दाखिल की है। अब ये जोड़ी तलाक ले रही हैं और लोग राहुल गांधी को लानत दे रहे हैं ‘दिख गई सहजता। दिखा लिया भाईचारा।।‘
आज कांग्रेस की जो हालत है या राहुल गांधी की जो हालत है वो इस वजह से है क्योंकि राहुल ने हर मुद्दे में केवल जाति व धर्म का एंगल खोजा और उसका तुष्टीकरण किया। उन्होंने सर्व समाज से बातें करने में हमेशा परहेज किया। केवल धर्म और जातियों में खास दृष्टिकोण खोजते रहे।
अब तक देखने में आया है कि घटना किसी दलित के साथ हुई है तो वह एक्शन लंेगे और यदि वह दलित कांग्रेस शासित राज्य में है तो एक्शन नहीं लेंगे। उसी प्रकार कोई घटना मुस्लिम के साथ है तो वह आवाज उठाएंगे और यदि वह मुस्लिम अपने शासित राज्य में है तो वो आवाज दबा दंेगे।
इसी कारण से कांग्रेस की हालत यह हो गई है कि लोग उन्हें धर्म और जाति का मुद्दा उठते ही लोग लानत देने लगते हैं।

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